उज्जैन। मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित सेवाधाम आश्रम में पिछले एक वर्ष के भीतर 17 बच्चों की मौत का मामला अब गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट इंदौर खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज करने और दो सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद प्रशासन हरकत में आया है और विभागीय स्तर पर जांच शुरू कर दी गई है।
उज्जैन के अंबोदिया गांव में संचालित सेवाधाम आश्रम में निराश्रित, बुजुर्ग, मानसिक और शारीरिक रूप से दिव्यांगजन रखे जाते हैं। यहां वर्तमान में लगभग 1200 लोग रह रहे हैं, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं। इस आश्रम को लेकर पहले भी व्यवस्थाओं और मौतों के मामलों में सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस बार मामला और गंभीर है।
करीब एक साल पहले इंदौर के युगपुरुष आश्रम में हैजे से 10 बच्चों की मौत के बाद राज्य सरकार ने 25 दिसंबर 2024 को आश्रम बंद कर दिया था। वहां रह रहे 86 विशेष बच्चों, जिनकी उम्र 5 से 23 वर्ष के बीच थी, को उज्जैन के सेवाधाम आश्रम में शिफ्ट किया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इन्हीं 86 बच्चों में से 17 की मौत हो चुकी है और सभी मामलों में कारण ‘सांस लेने में तकलीफ’ बताया गया है।
उज्जैन जिला अस्पताल और इलेक्ट्रिक शवदाह गृह के रिकॉर्ड की पड़ताल में इन मौतों की पुष्टि हुई है। बताया जा रहा है कि शिफ्टिंग के लगभग एक माह बाद, 23 जनवरी 2025 से मौतों का सिलसिला शुरू हुआ। इस खुलासे के बाद सेवा आश्रमों में बच्चों की देखभाल, इलाज और मॉनिटरिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव और आयुक्त, कलेक्टर उज्जैन, पुलिस अधीक्षक, जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी तथा सेवाधाम आश्रम के अधीक्षक को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 12 मार्च को प्रस्तावित है।
इस बीच महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी ने कहा है कि शासन ने मामले को संज्ञान में लिया है और अंतरविभागीय समिति जांच कर रही है। हालांकि अधिकारियों को मौतों की सटीक संख्या और कारणों की स्पष्ट जानकारी नहीं होने पर भी सवाल उठ रहे हैं। त्रुटि पाए जाने पर कार्रवाई की बजाय सुधारात्मक कदमों की बात कही जा रही है।
वहीं आश्रम संचालक सुधीर भाई गोयल ने अपने पक्ष में कहा है कि इंदौर से भेजे गए कई बच्चे अत्यंत नाजुक और संक्रमित स्थिति में थे, और यदि सेवाधाम उन्हें स्वीकार नहीं करता तो आधे से अधिक बच्चों की मौत पहले ही हो सकती थी।
अब सभी की नजरें जांच रिपोर्ट और हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, क्योंकि यह मामला केवल एक आश्रम का नहीं बल्कि संवेदनशील बच्चों की सुरक्षा और सरकारी निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल बन चुका है।

