जबलपुर। मध्यप्रदेश के जबलपुर के 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी ने वो कर दिखाया जो बड़े-बड़े वकील भी नहीं कर पाते। डॉक्टर बनने का सपना लिए अथर्व ने सिर्फ परीक्षा ही नहीं लड़ी, बल्कि अदालत में भी अपनी किस्मत खुद लिखी। उन्होंने निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS कोटे के तहत प्रवेश के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट में खुद अपनी पैरवी की और आखिरकार जीत हासिल की।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच उठने ही वाली थी कि अथर्व ने अपनी बात रखने की गुजारिश की। ऑनलाइन माध्यम से उन्होंने अपने तर्क इतने मजबूती से रखे कि जज भी हैरान रह गए। 10 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अथर्व को MBBS में प्रवेश देने का आदेश सुना दिया और उनका डॉक्टर बनने का सपना सच हो गया।
इससे पहले मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। साल 2024 और 2025 में अथर्व ने दो बार NEET परीक्षा क्वालीफाई की, पहली बार 530 अंक हासिल किए। उन्होंने तीन बार हाईकोर्ट और तीन बार सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ी। 2024 में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत ने उनकी दलीलें सुनकर यहां तक कह दिया था कि तुम्हें डॉक्टर नहीं, वकील बनना चाहिए क्योंकि ऐसे वकीलों की कमी है।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अथर्व 2024 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे जहां जस्टिस गवई की बेंच ने उन्हें हाईकोर्ट में रिव्यू फाइल करने को कहा। 2025 में हाईकोर्ट ने रिव्यू भी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने फिर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की, जो पहले खारिज हुई, लेकिन अथर्व ने हार नहीं मानी। 24 नवंबर 2025 को वे तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और अंततः न्याय मिला।
गौरतलब है कि 2022 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने EWS के तहत निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश को मान्यता दी थी। उसी फैसले को आधार बनाकर अथर्व ने अपनी दलील रखी और आज उनका संघर्ष उन युवाओं के लिए मिसाल बन गया है जो अपने सपनों के लिए हर मोर्चे पर लड़ने को तैयार हैं।

