मऊगंज। मध्यप्रदेश के Mauganj स्थित जिला अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री Mohan Yadav ने सरकारी कर्मचारियों को समय पर दफ्तर पहुंचने के सख्त निर्देश दिए हैं, वहीं मऊगंज सिविल अस्पताल का हाल कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। यहां डॉक्टरों की गैरहाजिरी, दवा काउंटर पर ताले और अनुभवहीन कर्मचारियों द्वारा मरीजों का इलाज किए जाने की बात सामने आई है।
बताया जा रहा है कि सुबह इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे मरीजों को डॉक्टरों के बजाय सन्नाटा और बंद काउंटर मिले। सुबह 9 बजे ओपीडी की पर्ची कटने के बाद भी करीब 9 बजकर 35 मिनट तक कोई डॉक्टर अपनी सीट पर मौजूद नहीं था। मरीज इंतजार करते रहे, लेकिन डॉक्टर सुबह 10 बजे तक भी अस्पताल नहीं पहुंचे। इस दौरान जब डॉक्टर पंकज पांडेय अस्पताल पहुंचे तो उन्होंने देर से आने की बात स्वीकार करने के बजाय अपने बचाव में सफाई दी, जबकि अस्पताल की फुटेज और मरीजों की लंबी प्रतीक्षा अलग ही तस्वीर दिखा रही थी। बताया जा रहा है कि अस्पताल में न तो आंखों के विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं और न ही रेबीज का इंजेक्शन उपलब्ध है।
सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई कि अस्पताल में कई जरूरी काम अनुभवहीन आउटसोर्स कर्मचारियों से करवाए जा रहे हैं। आरोप है कि जिन कर्मचारियों को एक्सरे मशीन चलाने का ठीक से प्रशिक्षण भी नहीं है, वे मरीजों की जांच कर रहे हैं। यहां तक कि जिन्हें इंजेक्शन लगाने का अनुभव नहीं है, उनके भरोसे मरीजों का इलाज किया जा रहा है। ऐसे में अस्पताल आने वाले गरीब और जरूरतमंद मरीजों की जान जोखिम में पड़ती दिखाई दे रही है।
दूसरी ओर आउटसोर्स कर्मचारियों ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्हें पिछले चार महीनों से वेतन नहीं मिला है। वहीं सफाईकर्मियों ने भी आरोप लगाया कि उनके वेतन में कटौती की जा रही है। इस पूरे मामले में अस्पताल प्रशासन और ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर पर मनमानी के आरोप लग रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है और आम आदमी की जिंदगी खतरे में है। आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर का ध्यान सरकारी अस्पताल की व्यवस्था सुधारने के बजाय अपने निजी क्लीनिक पर ज्यादा रहता है। अब इस पूरे मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

