इंदौर। मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में आय से अधिक संपत्ति के मामलों में लोकायुक्त की कार्रवाई के दौरान भ्रष्टाचार का एक नया पैटर्न सामने आने का दावा किया जा रहा है। आरोप है कि रिश्वत और भ्रष्टाचार से कमाई गई रकम को अब घर में नकद रखने के बजाय जमीन, प्लॉट और रियल एस्टेट में निवेश किया जा रहा है। यही वजह है कि हालिया छापों में अफसरों के घरों से भले ही बड़ी मात्रा में कैश नहीं मिला, लेकिन जमीन-जायदाद के दस्तावेजों ने जांच का दायरा काफी बढ़ा दिया है।
लोकायुक्त पुलिस की चार बड़ी कार्रवाइयों में किसी भी अधिकारी या कर्मचारी के ठिकाने से 10 से 12 लाख रुपये जैसी बड़ी नकद रकम बरामद नहीं हुई। इसके बजाय जांच टीम को करोड़ों रुपये की जमीन, रिहायशी प्लॉट और रियल एस्टेट निवेश से जुड़े दस्तावेज मिलने की जानकारी सामने आई है।
नगर निगम के मुकेश पांडे के ठिकाने पर छापे के दौरान अलमारी से करीब 2 लाख 23 हजार रुपये नकद मिले। लेकिन जांच जब दस्तावेजों तक पहुंची, तो करोड़ों रुपये की जमीनों और रिहायशी प्लॉट से जुड़े कागजात सामने आए।
वहीं बिजली कंपनी से जुड़े एक अधिकारी के यहां करीब 2 लाख रुपये कैश के साथ 4 किलो चांदी और करीब 300 ग्राम सोने के जेवरात मिलने की जानकारी है। हालांकि, जांच में आय से अधिक संपत्ति का बड़ा हिस्सा जमीन और दूसरी संपत्तियों में निवेश के रूप में होने का दावा किया गया है।
एक अन्य मामले में अधिकारी के परिजनों के नाम पर 10 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत की जमीन और प्लॉट से जुड़े दस्तावेज मिलने की बात सामने आई है। अब लोकायुक्त इन संपत्तियों के स्रोत और अधिकारियों की घोषित आय के बीच अंतर की जांच कर रही है।
जांच एजेंसियों को शक है कि कार्रवाई के डर से अवैध कमाई को नकद रखने के बजाय जमीन-जायदाद में लगाया जा रहा है, ताकि संपत्ति को लंबे समय तक छिपाकर रखा जा सके। हालांकि, किसी संपत्ति को बेनामी या अवैध मानने से पहले जांच और

