बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी को बड़ी चोट दी है। शुरुआती रुझान साफ बता रहे हैं कि पार्टी एक भी सीट जीतने की दौड़ में नहीं है। एग्जिट पोल्स ने 0 से 5 सीटों का अनुमान दिया था, लेकिन वास्तविक तस्वीर इससे भी अधिक निराशाजनक नजर आ रही है। जिन प्रत्याशियों को प्रशांत किशोर का सबसे मजबूत बताया जा रहा था, वे भी किसी तरह की टक्कर देते दिखाई नहीं दे रहे। विधानसभा उपचुनावों में 10% से ज्यादा वोट हासिल करने के बाद यह उम्मीद थी कि जन सुराज कम से कम वोटकटवा की भूमिका तो निभाएगी, लेकिन कई सीटों पर पार्टी 5% वोट भी नहीं जुटा पाई।
चुनाव प्रचार के दौरान जन सुराज की सभाओं में जुटी विशाल भीड़ ने यह धारणा बनाई थी कि प्रशांत किशोर इस बार एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए चुनौती खड़ी करने जा रहे हैं। उनके रोड शो और जनसभाओं ने माहौल तो जरूर बनाया, लेकिन यह भीड़ वोटों में बदलने में पूरी तरह नाकाम रही। नतीजे बताते हैं कि जमीन पर पार्टी का संगठन मजबूत नहीं था और बूथ स्तर की तैयारी बेहद कमजोर रही। तीन साल की पदयात्रा और हजारों सभाओं के बाद भी जन सुराज चुनावी मैदान में अपनी पहचान बनाने में असफल साबित हुई है।
अब सबसे बड़ा सवाल खुद प्रशांत किशोर के उस वादे को लेकर खड़ा है, जो उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान एक राष्ट्रीय टीवी इंटरव्यू में किया था। उन्होंने दावा किया था कि जेडीयू 25 से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाएगी, और अगर ऐसा हुआ तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे। जब पत्रकार ने उनसे यह बात दोबारा पूछी तो उन्होंने फिर दोहराया था कि—even if उनकी पार्टी सत्ता में आ जाए—फिर भी अगर जेडीयू 25 से अधिक सीटें जीतती है, तो वे राजनीति छोड़ देंगे।
अब जबकि रुझानों में जेडीयू आराम से 25 के आंकड़े को पार कर चुकी है और एनडीए भारी बहुमत से सरकार बनाते नजर आ रहा है, पूरा बिहार इसी बात पर नजर टिकाए बैठा है कि क्या प्रशांत किशोर अपने वादे पर कायम रहते हैं। इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि यह हार सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक प्रतिष्ठा की भी परीक्षा है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि पीके राजनीति से संन्यास का ऐलान करते हैं या फिर इसे अपनी “नई शुरुआत” बताते हुए दोबारा मैदान में उतरने की कोशिश करेंगे।

