भोपाल. मध्य प्रदेश की पारंपरिक जनजातीय भरेवा शिल्प कला को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मंगलवार को नई दिल्ली में बैतूल जिले के भरेवा शिल्पकार बलदेव वाघमारे को राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार से सम्मानित किया। इस अवसर पर केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह भी मौजूद रहे। हाल ही में भरेवा धातु शिल्प को जीआई टैग मिलने के बाद यह सम्मान इस पारंपरिक कला के लिए एक और बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
स्थानीय बोली में अरेवा का अर्थ भरने वाले से है और इसी से भरेवा शिल्पकारों की पहचान जुड़ी हुई है। भरेवा कलाकार गोंड जनजाति की एक उप-जाति से आते हैं, जिनकी धातु ढलाई की कला पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती आई है। यह शिल्प गोंड समुदाय की परंपराओं, आस्थाओं और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। भरेवा कारीगर देवताओं की प्रतीकात्मक मूर्तियों के साथ-साथ गहने भी बनाते हैं, जिनका उपयोग विवाह संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
भरेवा शिल्प में अंगूठियां, कंगन, बाजूबंद, कटार और विशेष आभूषण बनाए जाते हैं, जो आध्यात्मिक गुरुओं और तांत्रिकों के लिए भी खास माने जाते हैं। इसके साथ ही बैलगाड़ियां, मोर के आकार के दीपक, घंटियां, घुंघरु और दर्पण के कलात्मक फ्रेम जैसी सजावटी और उपयोगी वस्तुएं भी तैयार की जाती हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय शिल्प बाजार में भी अपनी पहचान बनाई है।
भरेवा समुदाय की आबादी मुख्य रूप से बैतूल जिले के कुछ इलाकों में केंद्रित है, जो भोपाल से करीब 180 किलोमीटर दूर है। बलदेव वाघमारे ने इस घटती हुई पारंपरिक कला को नई ऊर्जा दी है। उन्होंने अपनी मेहनत और समर्पण से टिगरिया गांव को एक शिल्प ग्राम के रूप में स्थापित किया, जहां आज कई भरेवा परिवार इस अनोखी कला को जीवित रखे हुए हैं।
बलदेव वाघमारे ने यह कला अपने पिता से सीखी और एक मास्टर कारीगर के रूप में अपनी पहचान बनाई। गोंड समुदाय की धार्मिक मान्यताओं की गहरी समझ रखने वाले भरेवा कारीगर भगवान शिव, माता पार्वती, ठाकुर देव और अन्य देवताओं की मूर्तियां बनाते हैं, जिन्हें शांति, समृद्धि और गांव की सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। छोटे से टिगरिया गांव में बलदेव भरेवा आज भी इस अमूल्य परंपरा को संजोए हुए हैं और उनकी यह उपलब्धि भरेवा शिल्प कला के लिए गर्व का क्षण बन गई है।

