इंदौर। इंदौर नगर निगम पर कर्मचारियों के हक दबाने का आरोप अब कानूनी मोर्चे पर भारी पड़ता नजर आ रहा है, 1391 कर्मचारियों को वैधानिक वेतनमान, पदोन्नति और अवकाश के अधिकार सालों तक नहीं मिले और फाइलों में उलझाकर रखे गए मामलों पर अब श्रम आयुक्त ने अंतिम नोटिस जारी कर दिया है, जिसमें साफ कहा गया है कि 10 दिन में आदेश लागू करो वरना कुर्की की कार्रवाई के लिए तैयार रहो, कर्मचारी संगठन इसे लेकर फौजदारी प्रकरण तक की चेतावनी दे रहे हैं।
यह विवाद 2013 से चला आ रहा है जब 10 साल की सेवा पूरी कर चुके कर्मचारियों के लिए समान कार्य के बदले समान वेतन और पदोन्नति की बात कही गई थी, लेकिन कर्मचारियों का आरोप है कि घोषणा सिर्फ कागजों तक सीमित रही और उन्हें हक की जगह इंतजार, पदोन्नति की जगह टालमटोल और वेतन सुधार की जगह खामोशी मिली, थक-हारकर कर्मचारी अदालत पहुंचे और मामला श्रम न्यायालय से औद्योगिक न्यायाधिकरण तक गया जहां 2023 में फैसला कर्मचारियों के पक्ष में आया और 1391 कर्मचारियों को समान वेतन, पदोन्नति, 15 दिन अर्जित अवकाश और 7 दिन आकस्मिक अवकाश देने के आदेश दिए गए।
इसके बाद भी नगर निगम ने आदेश मानने के बजाय कानूनी लड़ाई जारी रखी और मामला पहले हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, दोनों ही अदालतों ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और साफ कर दिया कि कर्मचारी अपने हक की लड़ाई में सही हैं, इसके बावजूद करीब 180 करोड़ रुपये की बकाया देनदारी को लेकर निगम की ओर से गंभीरता नहीं दिखाई गई।
अब सुप्रीम कोर्ट से स्थिति स्पष्ट होने के बाद श्रम आयुक्त ने सख्त रुख अपनाते हुए आदेश के तत्काल पालन का अल्टीमेटम दिया है, नोटिस में कहा गया है कि अगर तय समय में लाभ नहीं दिए गए तो नगर निगम की संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई की जाएगी, पहले दिए गए कारण बताओ नोटिस पर भी ठोस जवाब नहीं आया था और यही चुप्पी अब प्रशासन पर भारी पड़ सकती है।
संभाग मस्टर कर्मचारी यूनियन का कहना है कि अगर अब भी आदेशों की अनदेखी की गई तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी, यह मामला अब सिर्फ वेतन विवाद नहीं बल्कि अदालत के आदेशों की अवहेलना और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा सवाल बन चुका है, अब देखने वाली बात यह होगी कि नगर निगम कानून का सम्मान करता है या फिर कुर्की और फौजदारी कार्रवाई सच में हकीकत बनकर सामने आती है।

