शहडोल। हर इंसान का सपना होता है कि उसके सिर पर एक पक्की छत हो, एक ऐसा घर जहां वह सम्मान और सुकून के साथ जीवन जी सके, इसी सपने को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना लाई गई थी ताकि गरीब, वंचित और आदिवासी परिवारों को उनका अपना आशियाना मिल सके।
लेकिन शहडोल संभाग के अनूपपुर जिले के बरगंवा अमलाई नगर परिषद क्षेत्र में जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है, जहां बैगा आदिवासी परिवार आज भी बिना पक्की छत के जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं।
बरगंवा अमलाई नगर परिषद के वार्ड क्रमांक एक, दो और पांच में बड़ी संख्या में बैगा समुदाय के लोग रहते हैं, जिनके लिए सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता की बात तो होती है, लेकिन हकीकत में उन्हें आज भी कच्ची और जर्जर झोपड़ियों में रहना पड़ रहा है।
बारिश में टपकती छत, गर्मी में झुलसाती धूप और सर्दियों में कंपकंपाती ठंड इनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुकी है और इन्हीं हालातों के बीच राम प्रसाद बैगा अपनी बुजुर्ग मां के साथ टूटी-फूटी झोपड़ी में दिन काट रहे हैं।
मजदूरी कर परिवार चलाने वाले राम प्रसाद वर्षों से प्रधानमंत्री आवास के लिए आवेदन कर रहे हैं, नगर परिषद से लेकर जिला मुख्यालय तक चक्कर काट चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है।
उनकी मां की आंखों में आज भी एक ही आस है कि मरने से पहले अपने सिर पर एक पक्की छत देख सकें, लेकिन वक्त बीतता जा रहा है और उनका इंतजार खत्म नहीं हो रहा।
दर्दनाक सच यह भी है कि स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में कई ऐसे प्रभावशाली लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिल गया है, जिनके पास पहले से पक्के मकान और संसाधन मौजूद हैं, जबकि असली हकदार बैगा परिवार आज भी दर-दर भटक रहे हैं।
बैगा समाज के लोग अब संभागीय मुख्यालय तक गुहार लगा रहे हैं, लेकिन अफसरशाही की खामोशी उनकी उम्मीदों को धीरे-धीरे तोड़ती जा रही है।
अब सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री आवास योजना सच में जरूरतमंद बैगा परिवारों तक पहुंचेगी या फिर उनका हक फाइलों में ही कैद रह जाएगा, क्योंकि इन परिवारों की पथराई आंखें आज भी अपने सपनों के घर का इंतजार कर रही हैं।

