मध्य प्रदेश के 19 साल के छात्र अथर्व चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसी दलील रखी कि जज भी प्रभावित हो गए और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार फैसला उसके पक्ष में आ गया।
अथर्व ने दो बार NEET पास किया था लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS कैटेगरी से होने के बावजूद उसे निजी मेडिकल कॉलेज में MBBS में दाखिला नहीं मिला क्योंकि कहा गया कि प्राइवेट कॉलेजों में EWS कोटे का प्रावधान लागू नहीं है।
न्याय की तलाश में अथर्व पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट तक गया, शुरुआत में राहत न मिलने के बाद भी उसने हार नहीं मानी और जनवरी 2025 में दोबारा याचिका दाखिल कर ऑनलाइन सुनवाई की मांग की।
फरवरी में सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में अथर्व ने कहा कि मुझे बस 10 मिनट चाहिए, यह सुनकर जज हैरान रह गए क्योंकि यह दलील किसी वकील ने नहीं बल्कि एक 12वीं पास छात्र ने खुद रखी थी, कोर्ट ने उसकी पूरी बात सुनी और उसके तर्कों को गंभीरता से लिया।
सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत ने की जहां अथर्व ने कहा कि राज्य सरकार ने निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS कोटा लागू नहीं किया जबकि पात्र छात्र होने का खामियाजा छात्रों को नहीं भुगतना चाहिए, कोर्ट ने माना कि केवल नीति की कमी के कारण एडमिशन से इनकार नहीं किया जा सकता।
अथर्व ने नीट में 530 अंक हासिल किए थे और EWS कोटे के तहत MBBS में दाखिले की मांग कर रहा था, पहले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली थी लेकिन इस बार उसकी दलीलों ने पूरा मामला पलट दिया।
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि EWS वर्ग के योग्य छात्रों को 2025–26 सत्र के लिए प्रोविजनल MBBS एडमिशन दिया जाए और अथर्व को भी उसी सत्र में प्रोविजनल एडमिशन देकर सात दिनों के भीतर कॉलेज अलॉट किया जाए।

