भोपाल। देश के पहले स्वघोषित और विवादित किन्नर शंकराचार्य हिमांगी सखी के पट्टाभिषेक के बाद उनका बड़ा और बेबाक बयान सामने आया है। उन्होंने साफ कहा कि वे खुद को पांचवां नहीं बल्कि किन्नर समाज का पहला शंकराचार्य मानती हैं और यह समय की मांग है।
उन्होंने कहा कि परंपरागत चार शंकराचार्य अर्धनारीश्वर नहीं बल्कि पुरुष हैं, जबकि शंकराचार्य की गद्दी अर्धनारीश्वर स्वरूप का प्रतीक है। उनके मुताबिक किन्नर देवताओं की श्रेणी में आते हैं और आज सनातन समाज मार्गदर्शन चाहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि शंकराचार्य आपस में संघर्ष कर रहे हैं, एक-दूसरे पर लांछन लगा रहे हैं, जिससे समाज में भ्रम और गलत संदेश फैल रहा है। उनका कहना है कि जब जगतगुरु और शिष्य ही आपस में लड़ेंगे तो हिंदुत्व को नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि किन्नर समाज ने एकजुट होकर और ऋषि अजय दास के मार्गदर्शन में उन्हें किन्नर शंकराचार्य के रूप में स्वीकार किया है, इसलिए वे पांचवीं नहीं बल्कि किन्नर समाज की प्रथम शंकराचार्य हैं।
विरोध पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि संत समाज में विरोध आम बात है। जब कोई आगे बढ़ता है तो उसे रोकने की कोशिश की जाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि संतों के बीच भी तीखे बयान दिए जाते हैं, जिससे समाज में गलत संकेत जाता है।
अपने ऊपर उठ रहे सवालों को लेकर उन्होंने खुली चुनौती दी। उनका कहना है कि जिसे भी आपत्ति है वह अर्धनारीश्वर शंकराचार्य के साथ शास्त्रार्थ करे। उन्होंने खुद को शिव का स्वरूप बताते हुए कहा कि वे किसी भी तरह की बहस के लिए तैयार हैं।
समर्थन को लेकर उनका दावा है कि उन्हें देशभर के संत-महात्माओं और समाज का समर्थन मिला है। प्रयागराज कुंभ से पहले ही उन्हें जगतगुरु घोषित किया गया था। वहीं लक्ष्मी त्रिपाठी पर उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके खिलाफ झूठ फैलाया जा रहा है।
इस विवाद में ऋषि अजय दास का भी बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि वर्षों से किन्नर समाज के कुछ लोगों को इस्लामी ताकतों का समर्थन मिल रहा था और कई हिंदू किन्नरों का धर्मांतरण कराया गया था। उनका दावा है कि उन्होंने घर वापसी कराई और लव जिहाद के खिलाफ अभियान चलाया। उन्होंने कहा कि कई हिंदूवादी संगठनों का उन्हें समर्थन प्राप्त है।
शंकराचार्य विवाद पर उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक आस्था के विषय में बिना आधार के आरोप नहीं लगाने चाहिए। उनके अनुसार आदि शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना देश की एकता के लिए की थी और बाद में उन पर आसीन संत शंकराचार्य कहलाए। उनका कहना है कि शास्त्रों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि किसी शंकराचार्य ने दूसरे शंकराचार्य की नियुक्ति की हो, क्योंकि आदि शंकराचार्य 32 वर्ष की आयु में ही देवलोक गमन कर गए थे।

