मऊगंज। लोकतंत्र में जनसुनवाई जनता की आवाज़ सुनने के लिए होती है, लेकिन मऊगंज जिले के हर्रहा ग्राम पंचायत में यह जनसुनवाई अवैध धंधों को वैध बनाने का तमाशा बनती दिखी। प्रशासन के सामने एक आठ बच्चों की विधवा आदिवासी महिला ललिता मौर्य ने अपनी जमीन बचाने की आखिरी कोशिश में खुद पर पेट्रोल उड़ेल लिया और आत्मदाह करने की कोशिश की। महिला की चीख यही थी कि उसकी जमीन माफिया निगल गए हैं, लेकिन शिकायतें करने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हुई। हैरानी की बात यह है कि जिस जमीन पर पहले ही करीब 80 प्रतिशत उत्खनन हो चुका है, जहां पत्थर निकालकर पहाड़ छलनी कर दिया गया, उसी जगह पर आज प्रशासन ने लीज की सुनवाई के लिए तंबू गाड़ दिए। सवाल उठता है कि आखिर इन भू-माफियाओं को किसका संरक्षण मिला हुआ है।
ललिता मौर्य बताती है कि उसने अपनी जमीन बचाने के लिए कई बार अफसरों के दरवाज़े खटखटाए, लेकिन हर बार उसे सिर्फ आश्वासन मिले। जनसुनवाई के दौरान जब उसने खुद पर पेट्रोल डाला तो मौके पर मौजूद अपर कलेक्टर ने माचिस छीनकर उसकी जान बचाई, वरना आज प्रशासन के सामने एक और गरीब महिला की मौत हो सकती थी। यह घटना उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है, जो पीड़ित को सुनने के बजाय उसे टूटने पर मजबूर कर देती है।
जिस खनन परियोजना को लेकर यह सुनवाई हो रही थी, वह मेजर्स उदयपुर सप्लायर एंड कॉन्ट्रेक्टर के नाम पर प्रस्तावित बताई जा रही है। जिन खसरा नंबरों की जमीन पर लीज मांगी जा रही है, वहां पहले ही 80 से 100 फीट गहरी खाइयां खोदी जा चुकी हैं। नियम कहता है कि पर्यावरणीय स्वीकृति और लीज के बाद ही उत्खनन होगा, लेकिन यहां उलटा खेल हुआ। पहले पहाड़ खोद दिए गए, पत्थर बेच दिए गए और अब जब जमीन बर्बाद हो चुकी है, तब कागजों में सब कुछ वैध करने की कवायद चल रही है।
स्थानीय आदिवासी और गौड़ समाज के लोग आरोप लगा रहे हैं कि अवैध ब्लास्टिंग से उनके घरों और स्कूल की दीवारों में दरारें पड़ गई हैं, रास्ते उखड़ चुके हैं और पूरा इलाका खतरे के साए में जी रहा है। ग्रामीणों ने प्रशासन से गुहार लगाई कि दो किलोमीटर दूर बैठकर सुनवाई करने के बजाय मौके पर चलकर हालात देखें, लेकिन उनकी आवाज़ अनसुनी रह गई।
विडंबना यह है कि महज दो दिन पहले ही संयुक्त जांच दल ने यहां अवैध उत्खनन पकड़कर मशीनें जब्त की थीं और अब उसी अवैध काम को वैध बनाने की तैयारी चल रही थी। पीड़ित ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि उनकी जमीन माफिया से मुक्त कराई जाए, गड्ढों को भरा जाए ताकि वे अपने ही गांव में सुरक्षित रह सकें, लेकिन माफिया के समझौते और प्रशासन की चुप्पी ने उन्हें अपनी ही जमीन पर बेगाना बना दिया है।
प्रशासन का जवाब बस इतना है कि आपकी बात पर विचार किया जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि जब पहाड़ काट दिए गए, पत्थर लूट लिए गए और जमीन को मौत का कुआं बना दिया गया, तब अब किस बात पर विचार होगा। क्या मऊगंज प्रशासन उन माफियाओं पर कार्रवाई करेगा जिन्होंने आदिवासियों की पट्टे की जमीन को तबाही में बदल दिया है, या फिर किसी और मजबूर इंसान के पेट्रोल उड़ेलने का इंतजार किया जा रहा है।

