भू-अर्जन में किसानों के साथ धोखाधड़ी का आरोप, अधिनियम के प्रावधानों को दरकिनार कर पारित कर दिया गया अवार्ड

 सिंगरौली। मध्य प्रदेश का सिंगरौली जिला देश में ऊर्जाधानी के नाम से जाना जाता है। यहां कोयले की प्रचुर मात्रा होने के कारण बड़ी संख्या में कोयला खदानें संचालित हैं और इसी वजह से कई ताप विद्युत गृह भी यहां काम कर रहे हैं। कोयले के लगातार खनन के चलते पिछले कई वर्षों से खदानों के लिए जमीन अधिग्रहण का काम तेजी से किया जा रहा है, जो अभी भी जारी है। आमतौर पर सरकारी कंपनियां कोयला खदानों के लिए जमीन का अधिग्रहण कोल बेयरिंग एरियाज एक्ट के तहत करती हैं, जबकि निजी कंपनियों के लिए कोल ब्लॉक का भू-अर्जन 2013 के अधिनियम के तहत किया जाता है।

इसी बीच सिंगरौली जिले के बंधा कोल ब्लॉक को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। यह कोल ब्लॉक बिरला कंपनी की सहायक कंपनी ईएमआईएल के लिए अधिग्रहित किया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक कंपनी ने जमीन का मूल्य 20 लाख रुपये प्रति एकड़ तय किया था, जबकि मध्य प्रदेश सरकार के साथ हुए लिखित अनुबंध में प्रभावित किसानों को 50 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से भुगतान करने की बात कही गई थी और इसी आधार पर किसानों से सहमति भी ली गई थी।

आरोप है कि इस अनुबंध की जानकारी कंपनी ने जमीन अधिग्रहण करने वाली संस्था और सरकार को नहीं दी। प्रभावित किसान समय-समय पर बैठकों में इस मुद्दे को उठाते रहे, लेकिन न तो सरकार ने इसे गंभीरता से लिया और न ही कंपनी ने अपने आर्थिक हितों के कारण इस अनुबंध को सामने लाया।

परिणाम यह हुआ कि जहां जमीन की दर 50 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तय होनी चाहिए थी, वहां प्रभावित पांच गांवों की जमीन का अवार्ड मात्र 10 से 12 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से पारित कर दिया गया। अब आरोप लगाया जा रहा है कि अपनी गलती छिपाने के लिए जिम्मेदार अधिकारी अवार्ड को संशोधित करने के बजाय कंपनी को अंतर राशि भुगतान के लिए नोटिस जारी करने के निर्देश दे रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि कंपनी उस अनुबंध की दर को ही सोलेसियम और ब्याज सहित बताकर अवार्ड में घोषित प्रतिकर राशि से अंतर की गणना कर रही है और किसानों को अंतर राशि प्राप्त करने के लिए नोटिस जारी कर रही है। जबकि अधिनियम के अनुसार अवार्ड में त्रुटि सामने आने पर उसे संशोधित कर दोबारा पारित करना ही न्यायसंगत प्रक्रिया मानी जाती है।

फिलहाल इस पूरे मामले में शासन के प्रतिनिधि विधायक और विपक्षी दल के प्रदेश अध्यक्ष के बीच खींचतान की स्थिति बनी हुई है। बताया जा रहा है कि कलेक्टर को मध्यस्थ बनाकर मामले को सुलझाने की कोशिश की जा रही है। वहीं इस परियोजना से जुड़े कई और अनियमितताओं के आरोप भी सामने आने लगे हैं, जिनकी परतें धीरे-धीरे खुलने की बात कही जा रही है।

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