खातेगांव (देवास)। खेती को अक्सर सिर्फ परंपरा या गुजारे का साधन माना जाता है, लेकिन जब इसमें सही सोच, लगातार मेहनत और आधुनिक तकनीक जुड़ जाए, तो यही खेती मुनाफे का मजबूत और सम्मानजनक व्यवसाय बन जाती है। आज की यह स्पेशल स्टोरी एक ऐसे ही प्रगतिशील किसान की है, जिसने परंपरागत खेती की सीमाओं को तोड़कर नवाचार की राह चुनी और पूरे इलाके के लिए मिसाल बन गया।
देवास जिले के खातेगांव से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम इकलेरा के किसान ओम कुड़िया ने यह साबित कर दिखाया कि सोच बदलते ही खेती की तस्वीर बदल सकती है। बीते 11 वर्षों से ओम कुड़िया खेती को नए आयाम दे रहे हैं, जहां आसपास के किसान आज भी गेहूं, चना, मूंग और धान जैसी परंपरागत फसलों पर निर्भर हैं, वहीं ओम कुड़िया ने जोखिम उठाकर 10 एकड़ भूमि में उन्नत और नकदी फसलों की खेती शुरू की और इसे एक सफल मॉडल में बदल दिया।
ओम कुड़िया बताते हैं कि शुरुआत आसान नहीं थी, नई फसलें थीं, नई तकनीक थी और बाजार की समझ भी विकसित करनी पड़ी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अलग-अलग जगह जाकर खेती देखी, सफल किसानों से सीखा, कृषि विशेषज्ञों की सलाह ली और फिर अपने खेत में प्रयोग शुरू किए। उनका मानना है कि खेती सिर्फ बीज बोने और फसल काटने तक सीमित नहीं है, सही योजना और समय पर निर्णय ही सफलता की कुंजी है।
आज उनके खेतों में टमाटर, एप्पल बेर, हरी मिर्च और ड्रिप सिस्टम से चने की खेती हो रही है। फसलों की यही विविधता उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई है, क्योंकि एक फसल में नुकसान होने पर दूसरी फसल उसकी भरपाई कर देती है। बाजार की मांग, लागत और मुनाफे को ध्यान में रखकर किया गया फसल चयन ही उनकी सफलता की वजह है।
एप्पल बेर उनकी खेती का एक अहम हिस्सा है, जो दीर्घकालीन और बेहद लाभकारी फसल मानी जाती है। ओम कुड़िया बताते हैं कि एक बार एप्पल बेर का पौधा लगाने के बाद यह 25 से 30 साल तक उत्पादन देता है और सही देखरेख से लगातार अच्छी आमदनी होती है। इसकी मांग स्थानीय बाजार के साथ-साथ दूर की मंडियों तक बनी रहती है।
हरी मिर्च की खेती में भी ओम कुड़िया का अनुभव बोलता है। शुरुआती दौर में रोग, कीट और बाजार की अनिश्चितता जैसी चुनौतियां आईं, लेकिन अनुभव के साथ सब आसान होता गया। आज हरी मिर्च उनकी भरोसेमंद आय का जरिया बन चुकी है, जहां प्रति एकड़ 50 से 70 हजार की लागत में 300 से 400 क्विंटल तक उत्पादन लिया जा रहा है।
टमाटर की खेती में उनकी खास पहचान है, क्योंकि वे खुद नर्सरी तैयार करते हैं, जिससे पौधों की गुणवत्ता बनी रहती है और लागत कम होती है। एक एकड़ में 2500 से 3000 क्रेट तक टमाटर का उत्पादन लेकर वे प्रदेश की अलग-अलग मंडियों तक अपनी उपज पहुंचाते हैं और बेहतर दाम हासिल करते हैं।
चना खेती में भी उन्होंने आधुनिक तकनीक अपनाई है। ड्रिप इरिगेशन सिस्टम से हर पौधे की जड़ तक जरूरत के अनुसार पानी पहुंचाया जाता है, जिससे पानी की बचत होती है और फसल रोगों से काफी हद तक सुरक्षित रहती है। ड्रिप सिस्टम के जरिए खाद और पानी एक साथ देने से समय और लागत दोनों की बचत होती है।
ओम कुड़िया कहते हैं कि जो कुछ भी उन्होंने सीखा, वह अपने अनुभव और मेहनत से सीखा। आज आसपास के जिलों से किसान उनकी खेती देखने और सीखने आते हैं। उनका साफ संदेश है कि अगर किसान नई तकनीक अपनाएं, फसलों में विविधता लाएं और सरकारी योजनाओं का सही लाभ लें, तो खेती कभी घाटे का सौदा नहीं बनती।
ग्राम इकलेरा के किसान ओम कुड़िया की यह कहानी उन लाखों किसानों के लिए प्रेरणा है, जो बदलाव से डरते हैं। यह कहानी बताती है कि खेती का भविष्य तभी उज्ज्वल है, जब परंपरा के साथ नवाचार जुड़ जाए और सोच, तकनीक और मेहनत एक साथ आगे बढ़ें।

