उज्जैन। विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर में होली का पर्व इस बार भी परंपरा, श्रद्धा और भक्ति के रंगों के साथ मनाया गया। सुबह की शुरुआत दिव्य भस्म आरती से हुई, जहां बाबा महाकाल को विशेष हर्बल गुलाल अर्पित किया गया और शक्कर की मालाओं से उनका अलौकिक श्रृंगार किया गया। सुरक्षा के मद्देनज़र श्रद्धालुओं के लिए गुलाल ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध रखा गया था, लेकिन आस्था का सैलाब ऐसा उमड़ा कि मंदिर परिसर भक्तों से खचाखच भर गया।
परंपरा के अनुसार मंदिर परिसर में विधि-विधान से होलिका पूजन और दहन किया गया। मंत्रोच्चार के बीच हजारों श्रद्धालुओं ने इस पावन क्षण के दर्शन किए। उज्जैन में मान्यता है कि सबसे पहले बाबा महाकाल के आंगन में होलिका दहन होता है, उसके बाद ही पूरे शहर में होली का उत्सव मनाया जाता है। यही कारण है कि देश-विदेश से श्रद्धालु इस अनोखी होली के साक्षी बनने यहां पहुंचते हैं।
हालांकि इस बार होली के उत्साह पर चंद्रग्रहण का साया भी रहा। शाम 6 बजकर 32 मिनट से लगे 17 मिनट के चंद्रग्रहण को देखते हुए मंदिर की पूजा पद्धति और समय-सारिणी में बदलाव किया गया। सूतक काल के दौरान भगवान का स्पर्श पूरी तरह वर्जित रहा। ग्रहण समाप्ति के बाद संपूर्ण मंदिर का शुद्धिकरण किया जाएगा, तभी संध्या आरती और बाबा को भोग अर्पित किया जाएगा।
दो वर्ष पहले होली के अवसर पर गर्भगृह में हुए अग्निकांड की घटना को ध्यान में रखते हुए इस बार विशेष सतर्कता बरती गई और भक्तों को गर्भगृह में अबीर-गुलाल से दूर रखा गया।
इसके साथ ही 4 मार्च 2026 से चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से अश्विन पूर्णिमा तक आरतियों के समय में भी परिवर्तन लागू होगा। नई व्यवस्था के अनुसार भस्म आरती सुबह 4 से 6 बजे तक, दद्योदक आरती 7 से 7:45 बजे तक, भोग आरती 10 से 10:45 बजे तक, संध्या पूजन 5 से 5:45 बजे तक, संध्या आरती 7 से 7:45 बजे तक और शयन आरती रात्रि 10:30 से 11 बजे तक संपन्न होगी।
महाकाल की नगरी में इस तरह भक्ति और उत्सव का संगम देखने को मिला, जहां रंग भी थे, श्रद्धा भी थी और परंपरा की अनोखी आभा भी।

