इंदौर। मध्य प्रदेश के दो बड़े शहरों इंदौर और भोपाल में लागू कमिश्नरी सिस्टम अब गंभीर कानूनी सवालों के घेरे में आ गया है। करीब साढ़े तीन साल पहले बड़े प्रशासनिक बदलाव के रूप में यह व्यवस्था लागू की गई थी। उस समय सीआरपीसी के तहत नोटिफिकेशन जारी हुआ था, लेकिन बाद में भारतीय नागरिक सुरक्षा कानून लागू होने के बाद इसमें संशोधन किए गए। आरोप है कि संशोधित प्रावधानों के बावजूद इंदौर में एसीपी रैंक के अधिकारियों को मजिस्ट्रेट पावर दी जा रही है, जो कानून की मंशा के खिलाफ बताया जा रहा है।
इसी मुद्दे को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में एक याचिका दायर की गई है। कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए गृह विभाग के सचिव और इंदौर पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब तलब किया है। अदालत के इस रुख के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
याचिकाकर्ता और ई-कोर्ट एडवोकेट सौरभ त्रिपाठी का कहना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा कानून के अनुसार मजिस्ट्रेट पावर केवल पुलिस अधीक्षक या उनके समकक्ष अथवा उससे ऊपर के अधिकारियों को दी जा सकती है, जबकि एसीपी इस श्रेणी में नहीं आते। याचिका में दावा किया गया है कि एक एसीपी ने पिछले तीन वर्षों में सात हजार से अधिक लोगों को जेल भेजने के आदेश दिए हैं। शहर में कुल 16 एसीपी पदस्थ हैं, जिनमें से 12 के पास मजिस्ट्रेट पावर बताई जा रही है और वे एसीपी कोर्ट संचालित कर रहे हैं। ऐसे में यदि अधिकार देने की प्रक्रिया ही विवादित है तो इन आदेशों की वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
वहीं एडिशनल पुलिस कमिश्नर अमित सिंह का कहना है कि सरकार के गजट नोटिफिकेशन के आधार पर ही एसीपी को मजिस्ट्रियल पावर दी गई है और सभी कार्रवाई वैधानिक आदेशों के अनुरूप की जा रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि एसीपी को दी गई शक्तियों की कानूनी स्थिति पर सवाल खड़े होते हैं तो पिछले साढ़े तीन वर्षों में दिए गए हजारों आदेशों का क्या होगा। क्या मामलों की दोबारा समीक्षा होगी और क्या कमिश्नरी सिस्टम में बड़े बदलाव की नौबत आएगी। फिलहाल निगाहें चार हफ्ते बाद होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार का जवाब यह तय करेगा कि इंदौर का कमिश्नरी मॉडल जस का तस रहेगा या इसमें बड़ा संशोधन देखने को मिलेगा।

