प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 के एक हत्या मामले में करीब सौ साल के आरोपी धनी राम को 44 साल बाद बरी कर दिया है। जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस संजीव कुमार की डिवीजन बेंच ने फैसले में कहा कि अपील का दशकों तक लंबित रहना और आरोपी की अत्यधिक उम्र राहत देने के लिए प्रासंगिक आधार है, साथ ही मामले के तथ्यों में अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
यह मामला हमीरपुर का है, जहां 1982 में जमीन विवाद को लेकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। इस वारदात में मैकू, सत्ती दीन और धनी राम को आरोपी बनाया गया था। घटना के बाद मैकू फरार हो गया, जबकि हमीरपुर की सत्र अदालत ने 1984 में सत्ती दीन और धनी राम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद मामला अपील में हाईकोर्ट पहुंचा और वर्षों तक लंबित रहने के बाद अब जाकर फैसला आया।
हाईकोर्ट ने आदेश देते हुए कहा कि धनी राम के जमानत बॉन्ड समाप्त किए जाएं और उन्हें बरी किया जाता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला मामले के गुण-दोष के आधार पर है, क्योंकि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को कानूनी मानक के मुताबिक साबित करने में असफल रहा।
फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि दशकों तक चले मुकदमे के दौरान आरोपी ने जो मानसिक तनाव, अनिश्चितता और सामाजिक दुष्परिणाम झेले हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और अब यह देखना जरूरी है कि इतने वर्षों बाद इस मामले में न्याय की मांग क्या है। सुनवाई के दौरान धनी राम के वकील ने दलील दी कि आरोपी की उम्र करीब सौ साल है और उस पर सीधे गोली चलाने का आरोप नहीं है, बल्कि आरोप केवल उकसावे का था, जिसे अभियोजन पक्ष ठोस सबूतों के साथ साबित नहीं कर पाया।

