पशुपति पारस ने जारी की पहली उम्मीदवार सूची — JDU, RJD और चिराग पासवान की बढ़ी मुश्किलें!

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे सियासी बिसात पर नई चालें चली जा रही हैं। और अब बड़ा कदम उठाते हुए पशुपति कुमार पारस की पार्टी राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) ने अपनी पहली उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है।

महागठबंधन में जगह न मिलने के बाद पारस ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी अब समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन करेगी और बाकी सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी।

सूची जारी करते हुए पारस ने साफ कर दिया है कि RLJP अब केवल “नाम की पार्टी” नहीं, बल्कि “मैदान की ताकत” बनकर उभरेगी।

इस सूची में परिवारिक चेहरों और जमीनी कार्यकर्ताओं दोनों को मौका दिया गया है।
सबसे खास नाम है — अलौली (SC) से यशराज पासवान, जो कि खुद पशुपति पारस के बेटे हैं।
इसके अलावा बक्सर से धर्मेन्द्र राम (मेहतर), आरा से हरे कृष्ण पासवान, और वैशाली से राम एकबाल कुशवाहा को टिकट दिया गया है।
बराचट्टी से शिव कुमार नाथ निराला, मोहनिया से अनिल कुमार, और बरहरिया से सुनील पासवान जैसे कई नए चेहरे भी लिस्ट में जगह पाए हैं।

पारस की इस रणनीति को लेकर सियासी गलियारों में चर्चा है कि इसका सबसे ज्यादा असर जेडीयू, आरजेडी और चिराग पासवान की LJP (रामविलास) पर पड़ेगा।
क्योंकि जहां एक तरफ जेडीयू और आरजेडी अपने पारंपरिक वोटबैंक को बचाने में जुटे हैं, वहीं पारस की यह चाल कई सीटों पर समीकरण बदल सकती है।

पार्टी ने अपनी सूची में कुल 25 से अधिक उम्मीदवारों के नाम जारी किए हैं, जिनमें यादव, पासवान, कुशवाहा और अति पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों का अच्छा संतुलन देखने को मिला है।
स्पष्ट है कि RLJP सामाजिक समीकरण और परिवारिक पकड़ दोनों पर खेल रही है।

अब बात करें चुनाव की तारीखों की —
बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर दो चरणों में मतदान होगा —
पहला चरण 6 नवंबर, और दूसरा चरण 11 नवंबर को।
वहीं 14 नवंबर को नतीजे घोषित किए जाएंगे।

पारस ने अपनी घोषणा में कहा —
“हमारा लक्ष्य सिर्फ कुर्सी नहीं, बल्कि बिहार की असली राजनीति को नया चेहरा देना है। अब जनता तय करेगी कि विकास के नाम पर कौन सच्चा है और कौन सिर्फ नारे देता है।”

RLJP की इस सूची के बाद बिहार की सियासत में हलचल तेज हो गई है।
अब देखना यह होगा कि क्या पारस की ये चाल वाकई चिराग और महागठबंधन के अरमानों पर पानी फेर पाएगी,
या फिर यह सियासी दांव खुद उन्हीं के लिए चुनौती बन जाएगा।

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