तेजस्वी के करीबी नेता का यू-टर्न, भाजपा में शामिल होकर मचाई हलचल, एलटीसी केस में काट चुके है सजा

पटना। बिहार की सियासत में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। तेजस्वी यादव के करीबी माने जाने वाले नेता और पूर्व विधायक अनिल सहनी ने अचानक पार्टी बदलकर सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। मुजफ्फरपुर की कुढ़नी विधानसभा सीट से विधायक रह चुके अनिल सहनी ने राजद को अलविदा कह दिया है और अब वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं।

पटना स्थित भाजपा मीडिया सेंटर में हुए एक कार्यक्रम के दौरान अनिल सहनी ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। इस मौके पर केंद्रीय मंत्री और बिहार चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे। सहनी के साथ पूर्व विधायक आशा देवी ने भी भाजपा का दामन थाम लिया।

दिलचस्प बात यह है कि अनिल सहनी को राजद ने इस चुनाव में स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल किया था। लेकिन अब वही नेता एनडीए के मंच पर नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर ‘अति पिछड़ा वर्ग’ का अपमान करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि राजद में लगातार इस वर्ग की अनदेखी की जा रही थी।

सूत्रों के मुताबिक, अनिल सहनी अपने बेटे को कुढ़नी सीट से टिकट दिलाना चाहते थे, मगर पार्टी ने इस बार बबलू कुशवाहा को उम्मीदवार बना दिया। इसी नाराज़गी के बाद उन्होंने इस्तीफा भेजा और भाजपा में शामिल होने का फैसला कर लिया।

अनिल सहनी का राजनीतिक सफर कुढ़नी सीट से ही शुरू हुआ था। 2020 में वे राजद के टिकट पर चुनाव जीतकर भाजपा प्रत्याशी केदार प्रसाद गुप्ता को हराने में सफल रहे थे। लेकिन बाद में दिल्ली की एक अदालत ने एलटीसी घोटाले में दोषी पाए जाने पर उन्हें दो साल की सजा सुनाई, जिसके चलते उनकी विधायकी समाप्त कर दी गई। अदालत ने उनके चुनाव लड़ने पर तीन साल की रोक भी लगा दी थी।

राजद में आने से पहले वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के सदस्य थे और राज्यसभा भी जेडीयू के टिकट पर पहुंचे थे। इसी दौरान सरकारी खर्चे पर हवाई यात्रा यानी एलटीसी में फर्जीवाड़े का आरोप लगा, जिसके बाद सीबीआई ने मामला दर्ज किया था।

अब भाजपा में शामिल होकर अनिल सहनी ने न सिर्फ चुनावी गणित को नया मोड़ दे दिया है, बल्कि राजद के भीतर भी हलचल तेज कर दी है। सवाल अब यह है — क्या भाजपा इस ‘यू-टर्न’ को अपने पक्ष में भुना पाएगी, या यह फैसला अनिल सहनी के लिए सियासी रिस्क साबित होगा?

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