जेहि विधि होइ नाथ हित मोरा, करउँ सोइ मति मोहि न थोरा”—रामचरितमानस की ये पंक्तियाँ आज के मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। 2023 में जब प्रदेश राजनीति में बदलाव आया, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि शांत, जुझारू और दृढ़ इरादों वाले उज्जैन के डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री बनेंगे। उनके नाम पर कई तरह की चर्चा और आशंकाएँ उठीं, लेकिन दो साल बाद तस्वीर बिलकुल साफ है—डॉ. यादव ने स्वयं को एक निर्णायक, स्पष्टवादी और परिणाम देने वाले नेता के रूप में साबित कर दिखाया है।
दो साल पूरे होने पर उनका यह आत्मविश्वास भरा बयान—“मैं जो बोलता हूं, उसे पूरा करता ही हूं, चाहे दायरे क्यों न तोड़ने पड़ें”—सिर्फ राजनीतिक लाइन नहीं, बल्कि उनकी कार्यशैली का सच्चा सार है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी प्राथमिकताएँ बिल्कुल स्पष्ट रखीं—कृषि, सिंचाई, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, शिक्षा और कानून-व्यवस्था… और इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने ज़मीनी बदलाव लाकर दिखाए।
प्रदेश में सिंचाई क्षमता बढ़ाकर 100 लाख हेक्टेयर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में सिंचाई विकास ने किसानों को नई उम्मीद दी है। कृषि बजट को दोगुना करने का निर्णय भी इसी दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है।
भोपाल में मेट्रो शुरू होने की तैयारी लगभग पूरी है, इंदौर में मेट्रो चल रही है और 2026 से प्रदेश के अन्य शहर भी मेट्रो सुविधा से जुड़ेंगे। पीएम ई-बस सेवा के तहत इलेक्ट्रिक बसों का बड़ा बेड़ा तैयार हो रहा है। पर्यटन, रेलवे और शहरी विकास में अपने पुराने अनुभव को उन्होंने योजनाओं के तेज क्रियान्वयन में बदला है।
बुंदेलखंड इस बार सिर्फ कागज़ों में नहीं, ज़मीन पर विकास के कारण सुर्खियों में है। छतरपुर और दमोह मेडिकल कॉलेज समय से पहले तैयार हुए। नौरादेही अभयारण्य में चीता प्रोजेक्ट पर काम तेजी से चल रहा है। सागर का खाद कारखाना फिर से चालू करवाना सरकार के दृढ़ संकल्प की मिसाल है। डॉ. यादव घोषणा नहीं—प्रत्यक्ष काम में विश्वास रखते हैं।
पिछले समय में पुलिस पर उठे सवालों पर भी उन्होंने बिना हिचक कार्रवाई की। सिवनी डकैती हो या भोपाल छात्र हत्या मामला… दोषी पुलिसकर्मियों पर सख्त धाराओं में केस दर्ज हुआ। यहां तक कि मंत्री के रिश्तेदार पर भी कार्रवाई में उन्होंने कोई रियायत नहीं दी। उनका स्पष्ट संदेश रहा—“गलत करोगे तो भुगतना पड़ेगा।”
माओवादी समस्या पर भी उन्होंने ठोस काम किया और अब मध्यप्रदेश के तीनों जिले नक्सल मुक्त घोषित हो चुके हैं। चंबल में डकैत समस्या भी समाप्त हो चुकी है।
लाड़ली बहना योजना पर वित्तीय बोझ के आरोपों के बीच उन्होंने साफ कहा कि दो साल में सिर्फ 72 हजार करोड़ का कर्ज लिया गया है, जिसमें 30 हजार करोड़ पुराने कर्ज का मूलधन चुका दिया गया। उनका मानना है—“लोन लेना निवेश है, इससे विकास रुकता नहीं—तेज होता है।”
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बड़ा विस्तार दर्ज किया गया। प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 25 से अधिक हो गई है। सुपर स्पेशलिटी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। स्कूलों की संख्या और गुणवत्ता दोनों बढ़ी हैं। मानव विकास सूचकांक में भी सुधार हुआ है।
धार्मिक पर्यटन को आर्थिक विकास का नया इंजन बनाया गया है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण—2024 में उज्जैन में पहुँचे 7 करोड़ पर्यटक। महाकाल महालोक बनने से पहले जहां सालाना 30–40 लाख लोग आते थे, वहीं अब करोड़ों में संख्या दर्ज हो रही है। आने वाले समय में प्रदेश में 12 “लोक” विकसित होने वाले हैं, जो मध्यप्रदेश को धार्मिक पर्यटन के वैश्विक नक्शे पर शीर्ष पर ले जाएंगे।
रोजगार और उद्योग के मोर्चे पर भी दो साल बेहद मजबूत रहे। एक लाख सरकारी नियुक्तियाँ दी गईं, दो लाख युवाओं को निजी सेक्टर में रोजगार मिला और 7 लाख करोड़ का निवेश आया। औद्योगिक विकास दर केंद्र से अधिक होना संकेत देता है कि एमपी निवेशकों की पहली पसंद बन रहा है।
राजनीतिक मोर्चे पर भी डॉ. यादव ने वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर कैबिनेट में संतुलन बनाया और चुनौतियों का सामना शांत और निर्णायक नेतृत्व से किया।
इन दो वर्षों ने यह साबित कर दिया है कि डॉ. मोहन यादव केवल नाम के मुख्यमंत्री नहीं—बल्कि फैसले लेने वाले, चुनौतियाँ स्वीकार करने वाले और परिणाम देने वाले मुख्यमंत्री हैं। विकास की रफ्तार, प्रशासन की जवाबदेही, कानून-व्यवस्था की सख्ती और जनता का भरोसा—ये चार स्तंभ आज मध्यप्रदेश के बदलाव की पहचान बन चुके हैं।
डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश एक नए विकास अध्याय के दरवाज़े पर खड़ा है। आने वाले तीन साल प्रदेश के लिए निर्णायक होने वाले हैं—और प्रदेश की जनता यह महसूस कर रही है कि यह सरकार उम्मीदों पर खरी उतरने के लिए प्रतिबद्ध है।

