भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र 2026 में इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों का मुद्दा जोरदार तरीके से गूंजा। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि सवाल गलती किसकी है यह नहीं, बल्कि यह है कि सरकार चर्चा से क्यों बच रही है। उन्होंने कहा कि पीड़ित परिवारों से पूछा जाए कि सदन में इस पर चर्चा हो या नहीं। 27 करोड़ रुपये ठेकेदार को एडवांस दिए गए, फाइल तब तक नहीं चलती जब तक उस पर वजन न आ जाए। हम संवेदनाएं व्यक्त करने गए तो विरोध किया गया, इसमें राजनीति कहां है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कागजों में एक रात में पांच किलोमीटर लाइन डाल दी गई और करोड़ों रुपये निकाल लिए गए। हाईकोर्ट तक ने टिप्पणी की कि इंदौर में हेल्थ इमरजेंसी जैसे हालात हैं। क्या सरकार शुद्ध पानी नहीं दे सकती। भागीरथपुरा की घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन के भरोसे की मौत है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब इतनी मौतें हो चुकी हैं तो इसे सिस्टम की नाकामी क्यों नहीं माना जा रहा।
उमंग सिंघार ने कहा कि 2019 में पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने दूषित पानी को लेकर खुलासा किया था, फिर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। उन्होंने नगरीय प्रशासन मंत्री से जवाबदेही तय करने और इस्तीफे की मांग की। उनका कहना था कि जबलपुर, ग्वालियर और उज्जैन से भी ऐसी रिपोर्टें आई हैं और हालात चिंताजनक हैं।
कांग्रेस विधायक लखन घनघोरिया जबलपुर के 13 पानी के सैंपल सदन में लेकर पहुंचे और दावा किया कि सभी सैंपल फेल हैं। उन्होंने कहा कि मानव समाज में निष्ठुरता का स्थान नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह ने कहा कि इस घटना से इंदौर का नाम कलंकित हुआ है। जब पुरस्कार की बात आती है तो नेता सामने आते हैं, लेकिन जब ऐसी घटना होती है तो जिम्मेदारी से बचते हैं। उन्होंने मौतों के आंकड़ों में अंतर को भी गंभीर बताया।
हालांकि विधानसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि नियम 55(5) के तहत जिस विषय पर पहले चर्चा हो चुकी है, उस पर दोबारा चर्चा नहीं होगी। उन्होंने कहा कि मामले से जुड़े प्रश्न पटल पर आ चुके हैं और स्वास्थ्य मंत्री तथा मुख्यमंत्री जवाब दे चुके हैं। चूंकि मामला जांच आयोग में है, इसलिए स्थगन प्रस्ताव ग्राह्य नहीं किया गया। इसके बाद सदन में हंगामा जारी रहा और मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।

