निवाड़ी। धार्मिक नगरी ओरछा में आयोजित सप्त दिवसीय कथा के दौरान प्रख्यात संत राजेंद्र दास जी महाराज ने गौ रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और समाज से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार साझा किए। मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि गाय केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण, स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था की मजबूत आधारशिला भी है।
संत राजेंद्र दास जी महाराज ने कहा कि गोवंश की रक्षा किसी एक व्यक्ति, संस्था या संगठन की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि गोवध जैसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने के साथ-साथ समाज में व्यापक जागरूकता फैलाने की भी आवश्यकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि गाय के महत्व को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ा जाना चाहिए। उनका कहना था कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति में गाय की भूमिका और उसके महत्व के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपनी परंपराओं और मूल्यों को समझ सके।
स्वास्थ्य के विषय पर बोलते हुए संत ने गाय के गोबर और गौमूत्र की उपयोगिता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इनमें कई प्रकार के लाभकारी गुण माने जाते हैं और आधुनिक समय में बढ़ती बीमारियों के बीच प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक जीवनशैली का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
अपने आश्रम का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां करीब 15 हजार गोवंश मौजूद हैं। उन्होंने दावा किया कि कोरोना काल के दौरान गौशाला में रहने वाला कोई भी व्यक्ति संक्रमित नहीं हुआ। इसी अनुभव के आधार पर आश्रम में गौशाला में प्रवेश से पहले गौमूत्र अमृत अर्क के सेवन की परंपरा शुरू की गई है।
संत राजेंद्र दास जी महाराज ने कहा कि आज भी कई लोग पारंपरिक जीवनशैली अपनाकर स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। उन्होंने समाज में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और प्राकृतिक जीवनशैली को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
जनसंख्या संतुलन के मुद्दे पर भी उन्होंने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि देश में जनसंख्या वृद्धि के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर चर्चा और जागरूकता की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने संगठित समाज की भूमिका को लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बताया।
किसानों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए संत ने कहा कि पहले खेती पूरी तरह गौ आधारित होती थी। किसान खाद, बैल और पारंपरिक संसाधनों के सहारे खेती करते थे, जिससे उनकी लागत कम रहती थी और वे अधिक आत्मनिर्भर होते थे। लेकिन आज रासायनिक खाद, महंगे बीज, डीजल और मशीनों पर बढ़ती निर्भरता के कारण किसानों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि गौ आधारित प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाए और ऐसे किसानों को विशेष सब्सिडी तथा प्रोत्साहन दिया जाए, ताकि खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सके। संत ने कहा कि प्राकृतिक खेती न केवल किसानों की लागत कम कर सकती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली को भी मजबूत आधार प्रदान कर सकती है।

