भोपाल। 15 अगस्त आते ही पूरे देश में आजादी की कहानी याद की जाती है, लेकिन भोपाल की आजादी का इतिहास थोड़ा अलग है। 15 अगस्त 1947 को देश अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ, लेकिन उस समय भोपाल रियासत भारतीय संघ का हिस्सा नहीं बनी थी। यहां नवाब हमीदुल्लाह खान का शासन कायम था और भोपाल के भारत में विलय के लिए एक अलग संघर्ष शुरू हुआ।
भोपाल के इस इतिहास की गवाही आज भी शहर की कई ऐतिहासिक इमारतें देती हैं। गौहर महल, शौकत महल, सदर मंजिल, ताजमहल और जुमेराती का पुराना डाकघर… इन इमारतों ने नवाबी दौर से लेकर अंग्रेजी शासन, आजादी के आंदोलन और फिर भोपाल के भारतीय संघ में विलय तक का दौर देखा है।
गौहर महल
साल 1820 में बना गौहर महल भोपाल की पहली महिला शासिका कुदसिया बेगम के इतिहास से जुड़ा हुआ है। इसका इस्तेमाल उनके निवास के साथ-साथ प्रशासनिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में भी किया जाता था। महल में दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास जैसे हिस्से बनाए गए थे और इसकी वास्तुकला में भारतीय और मुगल शैली का खूबसूरत मेल दिखाई देता है।
कभी जिस जगह से भोपाल की सत्ता और प्रशासन से जुड़े अहम फैसले लिए जाते थे, वही गौहर महल आज भी शहर के पुराने राजसी इतिहास की कहानी सुनाता है।
शौकत महल
पुराने भोपाल के चौक इलाके के प्रवेश द्वार पर स्थित शौकत महल भी शहर की खास ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है। इसका निर्माण 1830 के दशक में हुआ था और इसे सिकंदर जहां बेगम को विवाह उपहार के तौर पर बनवाया गया था।
इस महल की सबसे बड़ी खासियत इसकी वास्तुकला है। यहां भारतीय शैली के साथ यूरोपीय और खास तौर पर फ्रांसीसी स्थापत्य का प्रभाव साफ दिखाई देता है। इसकी संरचना में चर्च जैसी आकृतियां और यूरोपीय शैली की झलक इसे भोपाल की दूसरी ऐतिहासिक इमारतों से अलग बनाती है।
सदर मंजिल
साल 1898 में बनी सदर मंजिल भोपाल के राजकीय इतिहास की एक अहम कड़ी है। इसका निर्माण नवाब शाहजहां बेगम ने कराया था। बाद में सुल्तान जहां बेगम के शासनकाल में इस इमारत का इस्तेमाल शाही दरबार और सार्वजनिक बैठकों के लिए किया जाने लगा।
सदर मंजिल में दरबार लगाया जाता था और महत्वपूर्ण सार्वजनिक विषयों पर चर्चा होती थी। आजादी के बाद भी इसका सरकारी उपयोग जारी रहा और साल 1953 में यहीं से भोपाल नगर निकाय के कामकाज की शुरुआत हुई।
इस तरह सदर मंजिल सिर्फ नवाबी दौर की निशानी नहीं है, बल्कि उस बदलाव की भी गवाह है जब भोपाल की शाही व्यवस्था धीरे-धीरे लोकतांत्रिक प्रशासन में बदल रही थी।
भोपाल का ताजमहल
भोपाल का ताजमहल आगरा के विश्व प्रसिद्ध ताजमहल से बिल्कुल अलग है। शाहजहां बेगम ने इसका निर्माण 1871 में शुरू कराया था और करीब 13 साल बाद 1884 में यह बनकर तैयार हुआ। यह शाहजहां बेगम का शाही निवास था और अपने समय के भव्य महलों में इसकी गिनती होती थी।
लेकिन इस इमारत की कहानी सिर्फ नवाबी शानो-शौकत तक सीमित नहीं है। 1947 में देश के विभाजन के बाद नवाब हमीदुल्लाह खान ने सिंधी शरणार्थियों को ताजमहल में रहने की अनुमति दी थी। ये परिवार करीब चार साल तक यहां रहे, जिसके बाद उन्हें बैरागढ़ स्थानांतरित किया गया।
इस तरह ताजमहल ने एक तरफ भोपाल की नवाबी विरासत देखी, तो दूसरी तरफ आजादी और विभाजन के बाद विस्थापन की कहानी को भी अपने भीतर समेटा।
जुमेराती का पुराना डाकघर
भोपाल की ऐतिहासिक इमारतों में जुमेराती का पुराना डाकघर भी खास महत्व रखता है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक इसका निर्माण 19वीं सदी के अंतिम दौर में हुआ था और यह शहर के शुरुआती सार्वजनिक डाकघरों में शामिल था। आज भी जुमेराती में डाकघर संचालित हो रहा है।
इस जगह का महत्व सिर्फ डाक व्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसका संबंध भोपाल के स्वतंत्रता आंदोलन से भी रहा है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 15 अगस्त 1947 के आसपास स्थानीय स्वतंत्रता समर्थकों ने जुमेराती डाकघर पर तिरंगा फहराया था।
उस दौर में भोपाल रियासत में शाही झंडे के अलावा किसी दूसरे झंडे को फहराने की अनुमति नहीं थी। यही वजह है कि जुमेराती डाकघर भोपाल के स्वतंत्रता संघर्ष की महत्वपूर्ण जगहों में गिना जाता है।
भोपाल को भारत का हिस्सा बनने में लगा था अलग वक्त
भोपाल के इतिहास की सबसे खास बात यही है कि 15 अगस्त 1947 को देश आजाद होने के बावजूद भोपाल उसी दिन भारतीय संघ का हिस्सा नहीं बना। उस समय यहां नवाब हमीदुल्लाह खान का शासन था और भोपाल रियासत के भारत में विलय को लेकर अलग संघर्ष चला।
आखिरकार 1949 में भोपाल भारतीय संघ का हिस्सा बना। यानी देश की आजादी के बाद भी भोपाल के लिए आजाद भारत में शामिल होने का एक अलग अध्याय बाकी था।
इन इमारतों में दर्ज है भोपाल की आजादी का इतिहास
आज जब भोपाल में 15 अगस्त का जश्न मनाया जाता है, तो इन इमारतों को सिर्फ पुरानी इमारतों के तौर पर देखना इस इतिहास को अधूरा समझना होगा।
गौहर महल महिला शासन और बेगमों के दौर की कहानी कहता है। शौकत महल बदलती स्थापत्य परंपराओं की निशानी है। सदर मंजिल नवाबी दरबार से लोकतांत्रिक व्यवस्था तक के बदलाव की गवाह है। ताजमहल आजादी और विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों की कहानी अपने भीतर समेटे है और जुमेराती डाकघर भोपाल के स्वतंत्रता आंदोलन की याद दिलाता है।
इन इमारतों की दीवारों में वह दौर आज भी दर्ज है, जब देश आजाद हो चुका था, लेकिन भोपाल को आजाद भारत का हिस्सा बनने के लिए संघर्ष का एक और अध्याय पूरा करना बाकी था।

