बड़वानी। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के आदिवासी बहुल पानसेमल विकासखंड से शिक्षा व्यवस्था की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो आजादी के दशकों बाद भी कई इलाकों की जमीनी हकीकत बयां करती है। यहां ग्राम पंचायत करणपुरा के संकुल क्षेत्र दोल्जर आंबा में दो प्राथमिक स्कूल आज भी पक्के भवन के बजाय झोपड़ी में संचालित हो रहे हैं। मासूम बच्चे इसी झोपड़ी में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
पानसेमल विधानसभा क्षेत्र के करणपुरा गांव के मोक्सर फलिया और दोल्जर आंबा के प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों के लिए न तो पक्का स्कूल भवन है और न ही पर्याप्त मूलभूत सुविधाएं। ग्रामीणों के मुताबिक स्कूलों में पीने के पानी की व्यवस्था भी नहीं है और स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क की स्थिति भी ठीक नहीं है।
मोक्सर फलिया की शिक्षिका अनीता डुडवे ने बताया कि वह साल 2003 से यहां पदस्थ हैं और जब से स्कूल शुरू हुआ है, तब से यह झोपड़ी में ही संचालित हो रहा है। सत्र 2025-26 में इस प्राथमिक विद्यालय में 23 बच्चे दर्ज हैं। यानी करीब दो दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद स्कूल को अपना पक्का भवन नहीं मिल सका है।
शिक्षिका के मुताबिक स्कूल भवन की समस्या को लेकर कई बार मौखिक और लिखित रूप से अधिकारियों को जानकारी दी गई, लेकिन अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं हो पाया। सबसे ज्यादा परेशानी बारिश के मौसम में होती है। झोपड़ी की छत जगह-जगह से टपकती है और पानी अंदर आने के कारण बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित होती है।
दोल्जर आंबा के गांव पटेल संदीप डुडवे ने बताया कि ग्रामीणों ने कई बार जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों से स्कूल भवन बनाने की मांग की है, लेकिन अब तक भवन का निर्माण नहीं हो सका। उनका कहना है कि गांव के बच्चों का भी सपना है कि वे अच्छी शिक्षा हासिल करके अधिकारी बनें और अपने भविष्य को बेहतर बनाएं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के अभाव में उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
इस पूरे मामले पर डीपीसी सोनालिका अचाले ने बताया कि जिले में सिर्फ एक-दो नहीं, बल्कि कई स्कूल भवन ऐसे हैं जो झोपड़ियों में संचालित हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि स्कूल भवनों के लिए वार्षिक योजना के तहत प्रस्ताव तैयार कर वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भेजे गए हैं।
अधिकारियों के मुताबिक जिले में करीब 89 जर्जर स्कूल भवनों को लेकर प्रस्ताव भेजा गया है। अब इन प्रस्तावों को मंजूरी मिलने का इंतजार है। स्वीकृति मिलते ही स्कूल भवनों के निर्माण का काम शुरू किया जाएगा।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि जिन बच्चों का बचपन आज झोपड़ी की टपकती छत के नीचे किताबों के साथ गुजर रहा है, उन्हें पक्की छत और बेहतर शिक्षा का इंतजार आखिर कब तक करना पड़ेगा। सरकार के प्रस्ताव और कागजी प्रक्रिया के बीच इन मासूमों का भविष्य हर बारिश में एक बार फिर सवालों के घेरे में खड़ा नजर आता है।

