उज्जैन। धार्मिक नगरी उज्जैन में विकास कार्यों के बीच एक ऐतिहासिक धरोहर के ढहने से सवाल खड़े हो गए हैं। महाकाल मंदिर से रामघाट जाने वाले मार्ग पर पुराने महाकाल थाने के पीछे सीढ़ियों के पास बना अति प्राचीन ‘महाकाल द्वार’ बीती रात करीब डेढ़ से दो बजे के बीच अचानक भरभरा कर धराशायी हो गया।
गनीमत रही कि हादसा आधी रात के वक्त हुआ, जब आसपास लोगों की आवाजाही नहीं थी। यही वजह रही कि एक बड़ा हादसा और जनहानि होने से टल गई। द्वार गिरने की सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे और हालात का जायजा लिया।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, आसपास विकास कार्यों के लिए की गई गहरी खुदाई के दौरान इस ऐतिहासिक पत्थर के द्वार को पर्याप्त सुरक्षा और बेस सपोर्ट नहीं दिया गया। आरोप है कि गहरी खुदाई के बाद कमजोर हुए आधार के बावजूद द्वार को बिना सहारे छोड़ दिया गया, जिसके चलते रात में यह अचानक ढह गया।
स्थानीय रहवासियों का कहना है कि यह सिर्फ एक पुराना गेट नहीं था, बल्कि उज्जैन की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा था। बताया जाता है कि द्वार के दोनों ओर गणेश प्रतिमाएं भी स्थापित थीं और प्राचीन समय में महाकाल दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालु गणेश जी के दर्शन करने के बाद इसी द्वार से आगे बढ़ते थे।
सबसे बड़ा सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि कुछ समय पहले ही उज्जैन विकास प्राधिकरण यानी UDA की ओर से करीब 2 करोड़ 12 लाख रुपये की लागत से इस द्वार का जीर्णोद्धार कराया गया था। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अगर विकास कार्य के दौरान ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षा नहीं मिल पाई, तो जिम्मेदारी किसकी है?
अब प्रशासन के सामने सिर्फ मलबा हटाने की चुनौती नहीं, बल्कि इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण में हुई कथित लापरवाही की जांच और जिम्मेदारी तय करने का सवाल भी खड़ा है।

