सतना। सरकार की ओर से कुपोषण से लड़ने के लिए लगातार अभियान और योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल मझगवां क्षेत्र से सामने आई एक तस्वीर इन कोशिशों के बीच बड़ी चुनौती दिखा रही है। यहां दो साल के एक मासूम का वजन महज 5.6 किलोग्राम पाया गया है और उसे गंभीर तीव्र कुपोषण यानी SAM की स्थिति में दूसरी बार पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया गया है।
मामला मझगवां के कानपुर गांव का है, जहां दो वर्षीय अभिराम मवासी गंभीर कुपोषण की स्थिति में मिला। 3 सितंबर 2026 को उसे मझगवां के पोषण पुनर्वास केंद्र यानी NRC में भर्ती कराया गया। यहां डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी में उसका उपचार और पोषण प्रबंधन किया जा रहा है। चिकित्सकों के मुताबिक अभिराम गंभीर तीव्र कुपोषण की श्रेणी में है और उसकी हालत पर लगातार नजर रखी जा रही है।
सबसे चिंता की बात यह है कि अभिराम को इससे पहले भी अप्रैल 2026 में NRC में भर्ती कराया गया था। उस समय इलाज और पोषण आहार मिलने के बाद उसकी सेहत में सुधार हुआ था और उसे घर भेज दिया गया था। लेकिन कुछ ही महीनों बाद उसकी हालत दोबारा बिगड़ गई। सितंबर में जब उसे फिर NRC लाया गया, तो उसका वजन महज 5.6 किलो पाया गया।
यानी एक तरफ NRC में इलाज के बाद बच्चे की हालत सुधारने की कोशिश की गई, लेकिन घर लौटने के बाद वह दोबारा गंभीर कुपोषण की चपेट में आ गया। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल बच्चों के इलाज के बाद होने वाले फॉलोअप और घर पर उनकी देखभाल को लेकर खड़ा हो रहा है।
विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक अभिराम की मां उसे छोड़कर चली गई है। ऐसे में घर पर उसकी नियमित देखभाल और पर्याप्त पोषण प्रभावित हुआ। स्वास्थ्य विभाग इस स्थिति को बच्चे के दोबारा कुपोषित होने की प्रमुख वजहों में से एक मान रहा है।
फिलहाल NRC में अभिराम को चिकित्सकीय उपचार के साथ निर्धारित पोषण आहार दिया जा रहा है। स्वास्थ्यकर्मियों के मुताबिक इलाज शुरू होने के बाद उसके वजन में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन उसकी स्थिति अभी भी गंभीर है और उसे लगातार चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत है। मझगवां BMO डॉ. रूपेश सोनी के मुताबिक अभिराम SAM की स्थिति में है और उसका वजन 5.6 किलोग्राम है।
मझगवां क्षेत्र में कुपोषण का यह पहला गंभीर मामला भी नहीं है। इससे पहले अप्रैल में सुरांगी गांव में जुड़वां भाई-बहन कुपोषित पाए गए थे। इलाज के दौरान दोनों में से सुप्रियाशी की सतना के PICU में मौत हो गई थी। इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने क्षेत्र में सर्वे कराया था और कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें NRC में भर्ती कराया गया था।
अभिराम का मामला एक बार फिर सरकार की कुपोषण के खिलाफ चल रही व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। NRC में भर्ती कर इलाज और पोषण देने के बाद जब बच्चा घर लौटता है, तो वहां उसकी सेहत और पोषण की निगरानी कितनी प्रभावी तरीके से होती है? क्या परिवार को पर्याप्त पोषण और देखभाल के लिए जरूरी मदद मिल रही है? और अगर बच्चा दोबारा कुपोषित हो रहा है, तो समय रहते इसकी पहचान क्यों नहीं हो पा रही?
क्योंकि कुपोषण से लड़ाई सिर्फ बच्चे को अस्पताल या NRC में भर्ती कराने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती तब शुरू होती है, जब बच्चा इलाज के बाद वापस अपने घर लौटता है। अभिराम की कहानी इसी चुनौती की एक गंभीर तस्वीर सामने रखती है।

