लखनऊ. बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती के सामने पार्टी की खोई जमीन वापस लाने की बड़ी चुनौती खड़ी है। लगातार चुनावी निराशा के बाद अब वे एक बार फिर पुराने और आजमाए हुए फार्मूले पर लौटती दिखाई दे रही हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में 403 सीटों में से केवल एक सीट पर जीत ने पार्टी के लिए खतरे की घंटी बजा दी थी, और यही वजह है कि अब रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो मायावती 2007 वाले सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को फिर से जमीन पर उतारने की तैयारी में हैं। उस चुनाव में ब्राह्मण उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में टिकट देकर उन्होंने सत्ता का रास्ता तैयार किया था। जीत के बाद कई ब्राह्मण नेताओं को मंत्री पद भी दिया गया था, जिसे उस समय एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना गया था।
अब एक बार फिर उसी रणनीति की झलक दिखाई दे रही है। जालौन की माधौगढ़ सीट से आशीष पांडेय को प्रत्याशी बनाकर इसकी शुरुआत हो चुकी है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि 2027 विधानसभा चुनाव में बसपा करीब 80 से 90 ब्राह्मण प्रत्याशियों पर दांव लगा सकती है।
इस रणनीति के पीछे हालिया राजनीतिक घटनाक्रम को भी अहम माना जा रहा है। प्रदेश में भाजपा के कई ब्राह्मण विधायकों की बैठक ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी। माना गया कि यह बैठक एक संदेश देने की कोशिश थी। ऐसे माहौल में मायावती ने मौके को भांपते हुए ब्राह्मण कार्ड फिर से खेलने की तैयारी शुरू कर दी है।
अब नजरें 2027 पर टिकी हैं कि क्या 2007 की तरह यह दांव फिर से कारगर साबित होगा। क्या यह सोशल इंजीनियरिंग मॉडल एक बार फिर सत्ता का रास्ता खोल पाएगा, या सियासी समीकरण बदल चुके हैं? फिलहाल इतना तय है कि बहनजी ने अपनी चाल चल दी है, और आने वाले चुनाव में इसका असर जरूर देखने को मिलेगा।

