भोपाल। मध्य प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव भले ही अभी करीब एक साल दूर हों, लेकिन कांग्रेस ने अपनी चुनावी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इस बार पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन को लेकर नया फॉर्मूला तैयार किया है। कांग्रेस अब सिर्फ बी-फॉर्म ही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों से बांड भी भरवाने की तैयारी में है, ताकि चुनाव जीतने के बाद दल-बदल की घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
दरअसल, पिछले निकाय चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा था। पार्टी के टिकट पर जीतकर जबलपुर, छिंदवाड़ा और मुरैना के महापौर बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे। इन घटनाओं ने कांग्रेस की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए थे। अब पार्टी चाहती है कि इस बार टिकट उसी नेता को मिले, जो जीतने के बाद भी पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा रहे।
इसी उद्देश्य से कांग्रेस ने प्रदेश के 16 बड़े नगर निगमों और प्रमुख नगरपालिकाओं के लिए वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें ऐसे उम्मीदवारों की तलाश करने का निर्देश दिया गया है, जिनकी जीतने की क्षमता के साथ-साथ पार्टी और उसकी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता भी मजबूत हो।
कांग्रेस का मानना है कि नगरीय निकाय चुनाव सिर्फ स्थानीय निकायों का चुनाव नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल साबित होता है। विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले होने वाले इन चुनावों के नतीजे प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि पार्टी इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।
कांग्रेस को आशंका है कि अगर जीतने वाले जनप्रतिनिधि बाद में दूसरी पार्टी का दामन थाम लेते हैं, तो संगठन और जनता दोनों का भरोसा कमजोर होता है। इसलिए पार्टी अब बांड के जरिए अपने उम्मीदवारों की निष्ठा सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है।
हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कागज पर किया गया यह वादा नेताओं को दल-बदल से रोक पाएगा, या फिर सियासत में हालात बदलने के साथ बांड भी बेअसर साबित होगा। इसका जवाब आने वाले निकाय चुनाव और उसके बाद की राजनीति ही देगी।

