“पुरानी बोतल में नई शराब” की तर्ज पर पुरानी बसों पर नई परत, किन्तु सड़कों पर वही खतरा

“पुरानी बोतल में नई शराब” की तर्ज पर पुरानी बसों पर नई परत, किन्तु सड़कों पर वही खतरा
भोपाल (विपिन कोरी, स्वतंत्र लेखक) : प्रदेश की सड़कों पर लंबे समय से चल रही पुरानी और जर्जर बसों पर केवल कुछ समय के ब्रेक के बाद नई परत चढ़ाकर उन्हें फिर दौड़ाने की व्यवस्था पर आमजन के जहन में सवाल उठ रहे हैं। “पुरानी बोतल में नई शराब” की तर्ज पर बसों का रूप भले ही नया नजर आ रहा है, लेकिन उनकी उम्र, तकनीकी स्थिति और यात्रियों की सुरक्षा पर सवाल जस के तस बने हुए हैं।
नई दिखाकर पुरानी बसों का संचालन केवल यात्रियों की सुविधा तक सीमित नहीं है। घिसे हुए टायर और ब्रेक, खराब स्टीयरिंग, इंजन संबंधी खराबियां तथा तकनीकी विफलता सड़क हादसों का जोखिम बढ़ा सकती हैं। वहीं पुराने इंजन से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण को बढ़ावा देगा। बसों में बार-बार होने वाली खराबियों के कारण यात्रियों को रास्ते में परेशानी तथा समय की हानि उठानी पड़ सकती है ऐसे में केवल रंग-रोगन या मरम्मत से बस को नया दिखाना समस्या का समाधान नहीं है और ना ही यात्रियों को कोई राहत। प्रत्येक पुरानी बस की फिटनेस, ब्रेक, टायर, इंजन, स्टीयरिंग, लाइट, आपातकालीन उपकरण और प्रदूषण मानकों की सघन जांच जरूरी है।
भ्रष्टाचार, व्यापम घोटाला, पेपर लीक, भर्ती घोटाला सहित अन्य तरह के सैकड़ों घोटाले से घिरी सरकार में ऐसे कौन से सलाहकार बैठे हैं जो हाशिए पर चल रही सरकार को और गर्त में धकेलकर उसकी फजीहत करने में लगे हुए हैं।
सरकार और परिवहन विभाग को चाहिए कि निर्धारित सुरक्षा मानकों पर खरी न उतरने वाली बसों के संचालन पर रोक लगाई जाए और यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। “नई परत से पुरानी बस नई नहीं बनती—सड़क पर जरूरी है सुरक्षित बस, न की चमकदार।”
आखिर वे कौन विभीषण है जो अपनों के ही सीने में खंजर घोंप रहे हैं, जिन्होंने, मुख्यमंत्री सहित दिल्ली से आए मंत्रियों और नेताओं को धोखे में रखकर नई बसों को आगे खड़ा किया और खटारा बसों को पीछे, ताकि उनकी नजर उन तक ना पहुंच सके। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए? क्योंकि बात तो दूर तक जाएगी।
सादर प्रकाशनार्थ

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