भोपाल। देशभर के रेजिडेंट डॉक्टर लगातार बढ़ते कार्यभार, 36-36 घंटे की ड्यूटी, नींद की कमी और मानसिक तनाव जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन यानी FAIMA के आरएमएस 2.0 सर्वे में सामने आए आंकड़ों ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सर्वे में शामिल 1,260 रेजिडेंट डॉक्टरों में से 87.5 फीसदी डॉक्टरों ने माना कि वे बर्नआउट का शिकार हैं, जबकि लगभग 88 फीसदी डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें पर्याप्त नींद तक नहीं मिल पाती। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि 61.8 फीसदी डॉक्टरों ने बताया कि वे लगातार 36 घंटे या उससे भी ज्यादा समय तक ड्यूटी करते हैं।
सर्वे के मुताबिक हर दूसरा रेजिडेंट डॉक्टर कभी न कभी रेजिडेंसी छोड़ने के बारे में सोच चुका है। वहीं करीब 17 फीसदी डॉक्टरों ने स्वीकार किया कि मानसिक दबाव इतना बढ़ जाता है कि उनके मन में खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार भी आते हैं। इसके अलावा लगभग 47 फीसदी डॉक्टर हर सप्ताह 80 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, जबकि 20 फीसदी से अधिक डॉक्टरों का कार्य समय 100 घंटे प्रति सप्ताह से भी ज्यादा है।
FAIMA का कहना है कि डॉक्टरों पर बढ़ते कार्यभार, स्टाफ की कमी, कम स्टाइपेंड, मानसिक स्वास्थ्य सहायता का अभाव और बॉन्ड जैसी व्यवस्थाओं का असर सिर्फ डॉक्टरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव मेडिकल शिक्षा और मरीजों की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है।
संस्था से जुड़े डॉ. पुनीत शर्मा ने बताया कि देशभर में किए गए इस सर्वे से साफ हुआ है कि रेजिडेंट डॉक्टरों को नियमित छुट्टियां नहीं मिल पातीं। अस्पताल की जिम्मेदारियों के साथ पढ़ाई का दबाव भी लगातार बना रहता है। पर्याप्त आराम और नींद न मिलने की वजह से उनकी मानसिक सेहत पर गंभीर असर पड़ रहा है। सर्वे के अनुसार करीब 90 फीसदी जूनियर डॉक्टर किसी न किसी स्तर पर बर्नआउट का सामना कर चुके हैं।
मध्य प्रदेश के आंकड़े भी राष्ट्रीय स्तर जैसे ही सामने आए हैं। FAIMA के नेशनल सेक्रेट्री और जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन मध्य प्रदेश के उपाध्यक्ष डॉ. यशवंत सिंह गुर्जर ने बताया कि राज्य में करीब 400 पीजी रेजिडेंट डॉक्टरों पर किए गए सर्वे में 70 से 80 फीसदी डॉक्टरों ने माना कि 36 घंटे से ज्यादा की लगातार ड्यूटी, ड्यूटी के बाद पर्याप्त आराम न मिलना और लगातार बढ़ते कार्यभार के कारण वे मानसिक तनाव, बर्नआउट और स्लीप डेप्रिवेशन का सामना कर रहे हैं।
रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. महेंद्र ने बताया कि जूनियर डॉक्टरों पर मरीजों के इलाज के साथ-साथ पढ़ाई का भी भारी दबाव रहता है। लंबे कार्य घंटे, परीक्षा की तैयारी और कई बार पारिवारिक जिम्मेदारियां भी मानसिक तनाव को बढ़ा देती हैं। उनका कहना है कि यदि डॉक्टरों को बेहतर कार्य वातावरण और पर्याप्त आराम मिलेगा, तभी वे पूरी क्षमता के साथ मरीजों को बेहतर इलाज दे सकेंगे।
इसी को देखते हुए रेजिडेंट डॉक्टरों ने कई महत्वपूर्ण मांगें भी रखी हैं। इनमें राष्ट्रीय स्तर पर ड्यूटी घंटों का नियमन, 36 घंटे से अधिक लगातार ड्यूटी पर रोक, लंबी ड्यूटी के बाद अनिवार्य विश्राम, मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और काउंसिलिंग की सुविधा, सभी राज्यों में समय पर समान स्टाइपेंड, प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली और बॉन्ड नियमों को अधिक व्यावहारिक बनाने जैसी मांगें शामिल हैं।

