ट्विशा शर्मा सुसाइड केस में नया मोड़: कोर्ट रूम नंबर 32 में छिपे होने के आरोपों से बढ़े सवाल, सुरक्षा व्यवस्था पर उठी उंगली

भोपाल। ट्विशा शर्मा सुसाइड मामले में आरोपी पति समर्थ सिंह और उसकी मां गिरिबाला सिंह पहले से ही जांच एजेंसियों के शिकंजे में हैं। लेकिन अब इस मामले में एक नया विवाद सामने आया है, जिसने न्यायिक व्यवस्था और कोर्ट परिसर की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले में दावा किया गया है कि 22 मई 2026 को, जब पुलिस और जांच एजेंसियां समर्थ सिंह की तलाश कर रही थीं, उस दौरान वह जबलपुर जिला एवं सत्र न्यायालय के कोर्ट रूम नंबर 32 में मौजूद था। इस घटना को लेकर शिकायत दर्ज कर निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एक फरार आरोपी अदालत परिसर तक कैसे पहुंचा और वहां इतनी देर तक कैसे मौजूद रहा।

इस संबंध में अधिवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने देश के मुख्य न्यायाधीश, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों को लिखित शिकायत भेजी है। शिकायत में कहा गया है कि समर्थ सिंह, जो भोपाल के कटारा हिल्स थाने में दर्ज दहेज प्रताड़ना सहित अन्य धाराओं के मामले में आरोपी था, न्यायालय परिसर में पाया गया। शिकायत के अनुसार, बाद में इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि समर्थ सिंह कोर्ट रूम नंबर 32 के भीतर छिपा हुआ था और उसने कमरे को अंदर से बंद कर रखा था। साथ ही उसे किसी प्रकार का संरक्षण मिलने की आशंका भी जताई गई है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि आरोपी को अदालत परिसर में प्रवेश कैसे मिला और यदि उसे किसी प्रकार की मदद मिली तो उसके लिए कौन जिम्मेदार था।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये सभी आरोप शिकायत के आधार पर लगाए गए हैं और इनकी सत्यता की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। फिलहाल इस मामले ने न्यायिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

इधर, मामले की जांच कर रही सीबीआई ने आरोपी समर्थ सिंह और गिरिबाला सिंह की न्यायिक हिरासत बढ़ाने की मांग की है। दोनों फिलहाल सीबीआई की हिरासत में हैं और एजेंसी ने अदालत से अनुरोध किया है कि उन्हें 30 जून तक न्यायिक हिरासत में रखा जाए। उल्लेखनीय है कि दोनों की 14 दिन की न्यायिक हिरासत की अवधि आज समाप्त हो रही है।

अब सभी की नजरें अदालत के अगले फैसले और इस नए विवाद की जांच पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि न्यायिक संस्थानों की सुरक्षा और पारदर्शिता से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल भी खड़े कर रहा है।

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