भोपाल। मध्य प्रदेश में अनुकंपा नियुक्ति के तहत नौकरी पाने वाले लिपिकों के सामने अब रोजगार बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। सीपीसीटी यानी कंप्यूटर प्रोफिशिएंसी सर्टिफिकेशन टेस्ट पास न कर पाने के कारण पिछले एक साल में प्रदेशभर में 1200 से ज्यादा कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त की जा चुकी हैं। अब इस फैसले के विरोध में कर्मचारी संगठनों ने बड़ा आंदोलन छेड़ने का ऐलान किया है। 10 अगस्त को प्रदेश के सभी 55 जिलों से हजारों कर्मचारी भोपाल पहुंचेंगे और मंत्रालय के सामने सामूहिक मुंडन कर शोक सभा के माध्यम से अपना विरोध दर्ज कराएंगे।
दरअसल, वर्तमान नियमों के अनुसार अनुकंपा नियुक्ति पर लिपिक पद पाने वाले कर्मचारियों को परिवीक्षा अवधि के दौरान निर्धारित समय सीमा में सीपीसीटी प्रमाणपत्र जमा करना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने पर उनकी सेवा समाप्त करने का प्रावधान है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य किसी सरकारी कर्मचारी की असामयिक मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक सहारा देना होता है, लेकिन सख्त नियमों के कारण अब वही परिवार फिर से संकट में आ गए हैं।
कर्मचारी मंच के प्रदेशाध्यक्ष अशोक पांडे का कहना है कि नौकरी से निकाले जा रहे कर्मचारियों में बड़ी संख्या 45 से 55 वर्ष आयु वर्ग के लोगों की है। इस उम्र में कंप्यूटर और टाइपिंग परीक्षा पास करना कई लोगों के लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। उनका दावा है कि केवल पिछले 15 दिनों में ही करीब 50 कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त हुई हैं, जबकि कई कर्मचारी न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं।
कर्मचारी संगठनों ने सरकार के सामने दो प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली, अनुकंपा नियुक्ति वाले लिपिकों के लिए सीपीसीटी परीक्षा की अनिवार्यता पूरी तरह समाप्त की जाए। दूसरी, क्षेत्रीय कार्यालयों में कार्यरत लिपिकों को मंत्रालय के कर्मचारियों के समान समयमान और वेतनमान दिया जाए, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था में वेतन को लेकर बड़ी विसंगतियां हैं।
हाल ही में शिवपुरी जिले में 21 कर्मचारियों की एक साथ सेवा समाप्त होने के बाद कर्मचारियों का आक्रोश और बढ़ गया है। 10 अगस्त को मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन के बाद कर्मचारी संगठनों का प्रतिनिधिमंडल मुख्य सचिव को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगों पर तत्काल निर्णय लेने की मांग करेगा।
इस मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो गई है। कांग्रेस ने सरकार पर कर्मचारी विरोधी रवैया अपनाने का आरोप लगाया है, जबकि भाजपा का कहना है कि कर्मचारी संगठनों की मांगों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है और जरूरत पड़ने पर नियमों में संशोधन भी किया जा सकता है। अब सबकी नजर 10 अगस्त के इस बड़े आंदोलन और सरकार की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हुई है।

