RE-NEET 2026: कुछ मिनट की देरी ने तोड़ दिया सपना, परीक्षा केंद्र के बाहर रो पड़े पिता, वीडियो वायरल

विदिशा। RE-NEET 2026 परीक्षा के दौरान मध्य प्रदेश के विदिशा से एक ऐसा भावुक मामला सामने आया है, जिसने परीक्षा व्यवस्था और उसकी सख्ती को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सालभर की मेहनत और बड़े सपनों के साथ परीक्षा देने पहुंची एक छात्रा को महज कुछ मिनट की देरी भारी पड़ गई और उसे परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं मिल सका।

21 जून 2026 को आयोजित RE-NEET परीक्षा में विदिशा के गर्ल्स कॉलेज परीक्षा केंद्र पर छात्रा रागिनी विश्वकर्मा अपने पिता के साथ परीक्षा देने पहुंच रही थीं। रास्ते में अचानक उनकी बाइक पंक्चर हो गई। इसी दौरान बारिश शुरू हो गई, जिससे परीक्षा केंद्र तक पहुंचने में देरी हो गई। जब वे केंद्र पर पहुंचीं, तब तक गेट बंद हो चुका था और नियमों का हवाला देते हुए उन्हें अंदर प्रवेश देने से मना कर दिया गया।

इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में देखा जा सकता है कि बेटी का एग्जाम छूट जाने से पिता खुद को संभाल नहीं पाए और परीक्षा केंद्र के बाहर ही फूट-फूटकर रोने लगे। वहीं बेटी अपने पिता को ढांढस बंधाती नजर आई। इस भावुक दृश्य ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है।

पिता ने दर्द भरे शब्दों में कहा कि जब पेपर लीक होता है या परीक्षा व्यवस्था में बड़ी गड़बड़ियां सामने आती हैं, तब जिम्मेदारी तय नहीं होती, लेकिन अगर कोई छात्र कुछ मिनट देर से पहुंच जाए तो उसे परीक्षा देने का मौका तक नहीं मिलता। उनका कहना था कि उनकी बेटी ने पूरे साल मेहनत की थी, लेकिन कुछ मिनटों की देरी ने उसका सपना छीन लिया।

NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए छात्र-छात्राएं महीनों नहीं बल्कि वर्षों तक तैयारी करते हैं। परिवार भी आर्थिक और मानसिक रूप से हर संभव सहयोग करता है। ऐसे में छोटी-सी बाधा या अप्रत्याशित परिस्थिति कई बार पूरे भविष्य पर भारी पड़ जाती है। यही वजह है कि इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग परीक्षा व्यवस्था में मानवीय संवेदनाओं को शामिल करने की मांग कर रहे हैं।

हालांकि NTA के नियम स्पष्ट हैं कि निर्धारित समय के बाद किसी भी अभ्यर्थी को परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं दिया जा सकता। लेकिन इस घटना के बाद कई अभिभावक और छात्र सवाल उठा रहे हैं कि क्या बाइक पंक्चर, खराब मौसम या अन्य आपात परिस्थितियों में कुछ लचीलापन नहीं होना चाहिए। खासकर तब, जब लाखों छात्रों का भविष्य एक ही परीक्षा पर निर्भर करता हो।

विदिशा की यह घटना अब केवल एक छात्रा की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि परीक्षा प्रणाली में नियमों और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ा सवाल बनकर सामने आ गई है।

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