ग्वालियर। देश के सबसे चर्चित राजघरानों में शामिल सिंधिया राजपरिवार की करीब 40 हजार करोड़ रुपये की पैतृक संपत्ति से जुड़े विवाद पर एक बार फिर अंतिम फैसला टल गया है। बुधवार को ग्वालियर जिला न्यायालय में इस मामले की सुनवाई हुई थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि दशकों पुराना विवाद आपसी समझौते के साथ खत्म हो जाएगा। लेकिन अंतिम समय में समझौते के कुछ बिंदुओं पर आपत्ति सामने आने के बाद मामला फिलहाल आगे बढ़ा दिया गया।
जानकारी के मुताबिक, सिंधिया राजपरिवार में पैतृक संपत्ति को लेकर विवाद की शुरुआत वर्ष 1988-89 में हुई थी। वर्ष 2001 में माधवराव सिंधिया के निधन के बाद यह कानूनी लड़ाई केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी तीनों बुआओं के बीच जारी रही। कई वर्षों तक यह मामला जिला न्यायालय और हाईकोर्ट में चलता रहा और अब यह अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है।
बुधवार को अदालत में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते से जुड़े आवेदनों पर सुनवाई हुई। माना जा रहा था कि सभी पक्ष अदालत में अपनी सहमति दर्ज कराकर इस लंबे विवाद का अंत कर देंगे, लेकिन सूत्रों के अनुसार एक पक्ष ने समझौते के कुछ बिंदुओं पर आपत्ति दर्ज कर दी। इसके बाद दोनों पक्षों ने अदालत से अपना पक्ष विस्तार से रखने के लिए अतिरिक्त समय मांगा।
अदालत ने दोनों पक्षों की आपसी सहमति की इच्छा को देखते हुए उन्हें और समय दे दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई या अदालत द्वारा तय अगली तारीख पर होगी। माना जा रहा है कि अगली सुनवाई में यदि सभी पक्ष पूरी तरह सहमत हो जाते हैं, तो अदालत संपत्ति बंटवारे पर अपनी अंतिम मुहर लगा सकती है।
करीब 40 हजार करोड़ रुपये की इस पैतृक संपत्ति में जयविलास पैलेस, ऊषा किरण पैलेस, रानी महल, छोटी विश्रांति, शिवपुरी का माधव विलास पैलेस, दिल्ली स्थित सिंधिया विला, ग्वालियर हाउस, वाराणसी का सिंधिया घाट समेत कई ऐतिहासिक संपत्तियां और अन्य महत्वपूर्ण परिसंपत्तियां शामिल हैं। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि किस वारिस को कौन-सी संपत्ति मिलेगी। इसकी अंतिम तस्वीर अदालत की मंजूरी के बाद ही सामने आएगी।
करीब चार दशक से चली आ रही यह कानूनी लड़ाई अब अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी है। हालांकि इस बार भी अंतिम फैसला नहीं हो सका, लेकिन माना जा रहा है कि अगली सुनवाई इस बहुचर्चित संपत्ति विवाद का निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।

