भोपाल। मध्य प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार के यूडाइस प्लस यानी UDISE+ पोर्टल की ताज़ा रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में पिछले सिर्फ एक साल के भीतर 2,426 स्कूल बंद हो गए हैं। इतना ही नहीं, हाईस्कूल स्तर पर बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बढ़कर 13 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह रिपोर्ट राज्य सरकारों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर केंद्र सरकार हर वर्ष तैयार करती है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल मध्य प्रदेश में करीब 1 लाख 22 हजार स्कूल थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर लगभग 1 लाख 19 हजार रह गई है। यानी एक साल में ही हजारों स्कूल कम हो गए। सरकारी स्कूलों में लगातार घटती छात्र संख्या और स्कूलों का बंद होना शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
रिपोर्ट में ड्रॉपआउट रेट भी चिंता बढ़ाने वाला है। कक्षा 6वीं से 8वीं तक लगभग 6.02 प्रतिशत बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं, जबकि कक्षा 9वीं और 10वीं में यह आंकड़ा बढ़कर 13 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। यानी हाईस्कूल में पहुंचते ही बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं शिक्षा से दूर हो रहे हैं।
शिक्षकों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों में केवल 22 प्रतिशत ही प्रशिक्षित शिक्षक हैं। वहीं 2,269 स्कूल ऐसे हैं, जहां पूरी पढ़ाई सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रही है। छात्र-शिक्षक अनुपात की बात करें तो कक्षा 1 से 5 तक 16 छात्रों पर एक शिक्षक, कक्षा 9 और 10 में 14 छात्रों पर एक शिक्षक तथा कक्षा 11 और 12 में 15 छात्रों पर एक शिक्षक उपलब्ध है।
रिपोर्ट में स्कूलों के बुनियादी ढांचे की भी कमजोर तस्वीर सामने आई है। प्रदेश के कुल 91 हजार 199 स्कूलों में से केवल 81 हजार स्कूलों में ही बिजली की सुविधा है। यानी करीब 10 हजार स्कूल आज भी बिना बिजली के संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा लगभग 9 प्रतिशत स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं है, जिसे लड़कियों के स्कूल छोड़ने का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। वहीं दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए सिर्फ 15 प्रतिशत स्कूलों में ही शौचालय की सुविधा उपलब्ध है।
यूडाइस प्लस की इस रिपोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि स्कूलों की संख्या, शिक्षकों की उपलब्धता, बुनियादी सुविधाओं और बच्चों के ड्रॉपआउट जैसे मुद्दों पर अभी भी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और बच्चों को स्कूलों से जोड़कर रखने के लिए प्रभावी कदम उठाना समय की बड़ी जरूरत बन गई है।

