इंदौर। इंदौर में कथित मानव तस्करी और नौकरी के नाम पर युवतियों को बंधक बनाए जाने का मामला अब और गंभीर होता नजर आ रहा है। इस मामले में खुद को पीड़ित बताने वाली आदिवासी युवतियां अब पुलिस पर भी गंभीर आरोप लगा रही हैं। उनका कहना है कि मदद मांगने पहुंचीं तो उन्हें न्याय देने के बजाय थाने से बाहर निकाल दिया गया।
आंखों में आंसू और चेहरे पर डर लिए ये युवतियां पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंचीं और अपनी आपबीती सुनाई। युवतियों का आरोप है कि उन्हें अच्छी नौकरी, बेहतर भविष्य और जल्दी पैसा कमाने का सपना दिखाकर इंदौर बुलाया गया था। यहां आने के बाद उनसे पैसे लिए गए और उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जाने लगी।
पीड़िताओं का दावा है कि उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं थी और यहां तक कि परिवार से बात करने पर भी रोक लगा दी गई थी। युवतियों को आशंका है कि उन्हें विदेश, खासकर दुबई भेजने की तैयारी की जा रही थी। मौका मिलते ही वे वहां से निकलने में कामयाब रहीं और अपने परिजनों तक पहुंच सकीं।
युवतियों का आरोप है कि जब वे शिकायत लेकर थाने पहुंचीं, तो उनकी बात गंभीरता से नहीं सुनी गई। उनका कहना है कि थाना प्रभारी ने उन्हें थाने से बाहर निकलवा दिया। अब वे पूरे मामले में एफआईआर दर्ज कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रही हैं।
इस बीच पुलिस के बयानों ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहले एडिशनल डीसीपी ने कहा था कि बंधक बनाए जाने की शिकायत मिली है और जांच की जा रही है। वहीं अगले दिन डीसीपी नरेंद्र रावत ने कहा कि न तो किसी तरह का अपहरण हुआ है और न ही पुलिस ने कोई छापेमारी की है। पुलिस का कहना है कि मामला पैसों के लेन-देन से जुड़ा हो सकता है।
हालांकि, युवतियां अपने आरोपों पर कायम हैं। उनका कहना है कि वे किसी आर्थिक विवाद के कारण नहीं, बल्कि अपनी जान और भविष्य बचाने के लिए वहां से भागीं। अब उनकी मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि मानव तस्करी या किसी अवैध गतिविधि के सबूत मिलते हैं, तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
फिलहाल, एक तरफ युवतियों के गंभीर आरोप हैं और दूसरी तरफ पुलिस का अलग पक्ष। ऐसे में अब सभी की नजरें जांच पर टिकी हैं कि आखिर सच क्या है और इस मामले में आगे कौन से तथ्य सामने आते हैं।

