कच्चा मकान ढहा तो गौशाला के टीन शेड में गुजरा जीवन! 3 महीने से PM आवास का इंतजार, उमरिया की बुजुर्ग आदिवासी महिला की दर्दनाक कहानी

उमरिया। मध्यप्रदेश में बारिश का दौर जारी है और इसी बीच उमरिया जिले से सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़ा करने वाला मामला सामने आया है। नौरोजाबाद नगर के वार्ड क्रमांक 4 में रहने वाली बुजुर्ग आदिवासी महिला सेम बाई का कच्चा मकान ढह गया। इसके बाद पिछले करीब तीन महीने से वह गौशाला के लिए बनाए गए खुले टीन शेड में रहने को मजबूर हैं।

उमरिया आदिवासी बहुल जिला है और सरकार की ओर से लगातार यह दावा किया जाता है कि जन विश्वास अभियान जैसे प्रयासों के जरिए लोगों की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। लेकिन सेम बाई की स्थिति इन दावों के बीच कई सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस बुजुर्ग महिला को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ कब मिलेगा?

सेम बाई का कहना है कि वह खुले टीन शेड में रहने को मजबूर हैं और बारिश के दौरान उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। उन्होंने बताया कि वह बुजुर्ग हैं और चलने-फिरने में भी परेशानी होती है। प्रधानमंत्री आवास के लिए उन्होंने आवेदन किया था और पिछले दो से तीन साल से नगर परिषद कार्यालय के चक्कर लगा रही हैं, लेकिन उन्हें अब तक आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला।

सेम बाई ने बताया कि उनका कोई सहारा नहीं है और अब उन्होंने यह उम्मीद भी लगभग छोड़ दी है कि उन्हें आवास का लाभ मिल पाएगा। उनका कहना है कि खुले टीन शेड में रहना बेहद मुश्किल है और वह चाहती हैं कि उनके लिए भी एक पक्का आवास बन सके, ताकि बारिश और मौसम की मार से उन्हें राहत मिल सके।

मामले को लेकर जब उमरिया कलेक्टर आईएएस राखी सहाय से बात की गई तो उन्होंने कहा कि संबंधित हितग्राही से आवेदन करवा दिया जाए, इसके बाद वह मामले की जांच करवाएंगी। जब कलेक्टर को बताया गया कि बुजुर्ग महिला को चलने में काफी परेशानी है, तो उन्होंने कहा कि किसी अन्य व्यक्ति से उनका आवेदन करवा दिया जाए, इसके बाद मामले की जांच कराई जाएगी।

अब सवाल यह है कि जिस बुजुर्ग महिला को खुद चलने में परेशानी हो रही है और जो लंबे समय से आवास के लिए कार्यालयों के चक्कर लगा रही है, क्या उसकी समस्या का समाधान सिर्फ एक और आवेदन से होगा? सरकार की योजनाओं का उद्देश्य अंतिम छोर तक बैठे जरूरतमंद व्यक्ति को लाभ पहुंचाना है, लेकिन सेम बाई की स्थिति यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंचने में आखिर इतनी देरी क्यों हो रही है।

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