गेहूं खरीदी केंद्रों पर किसानों की बदहाली! 6 किलोमीटर लंबी लाइन, 3 दिन से इंतजार… परेशान अन्नदाता बोला- ‘अब जहर खाना ही रास्ता बचा है’

कटनी। मध्य प्रदेश में गेहूं खरीदी को लेकर सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन कटनी जिले के सैलो पटोरी खरीदी केंद्र की तस्वीरें इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही हैं। यहां अन्नदाता अपनी ही फसल बेचने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। भीषण गर्मी, लंबी कतारें और अव्यवस्था ने किसानों की हालत ऐसी कर दी है कि अब उनका सब्र जवाब देने लगा है। 43 डिग्री की झुलसाती गर्मी में किसान कई-कई दिनों से ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर सड़क पर डटे हुए हैं। हालात इतने खराब हैं कि एक परेशान किसान ने कैमरे के सामने कह दिया कि इस प्रताड़ना से अच्छा तो जहर खा लेना है।

कटनी जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर बने इस खरीदी केंद्र पर हजारों ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की करीब 6 किलोमीटर लंबी लाइन लगी हुई है। किसान सड़क किनारे ही दिन-रात गुजारने को मजबूर हैं। किसी का ट्रैक्टर ही घर बन गया है तो कोई सड़क पर चादर बिछाकर रात काट रहा है। किसानों का कहना है कि नंबर आने में दो से तीन दिन लग रहे हैं और अगर खाने-पीने के लिए घर चले जाएं तो लाइन में पीछे कर दिए जाते हैं। कई किसान पिछले 72 घंटे से भूखे-प्यासे अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

किसानों ने आरोप लगाया कि खरीदी की प्रक्रिया बेहद धीमी है। आधे घंटे में ट्रैक्टर कुछ कदम ही आगे बढ़ पा रहे हैं। ऊपर से स्लॉट बुकिंग की तारीखों में अचानक बदलाव ने परेशानी और बढ़ा दी है। जिन किसानों की खरीदी की तारीख 9 मई थी, उसे बदलकर 6 मई कर दिया गया। अब किसान लाइन में खड़े हैं लेकिन तारीख निकलने का डर सता रहा है। कई किसानों का कहना है कि सिस्टम की गलती का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।

इस बीच भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी माहौल गर्मा दिया है। किसानों का कहना है कि पैसे लेकर कुछ ट्रैक्टरों को बीच से अंदर भेजा जा रहा है, जबकि आम किसान घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं। खरीदी केंद्र पर सुरक्षा व्यवस्था न होने से किसानों में लगातार विवाद की स्थिति बन रही है। किसानों ने आरोप लगाया कि यहां गुंडागर्दी और अव्यवस्था का माहौल है और अनाज चोरी होने का भी डर बना हुआ है।

मामले ने अब राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। कांग्रेस नेताओं ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि किसान खून के आंसू रो रहा है और सरकार सिर्फ दावे कर रही है। वहीं प्रशासन का कहना है कि सर्वर में तकनीकी खराबी के कारण यह स्थिति बनी है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अगर व्यवस्थाएं पहले से मजबूत होतीं तो अन्नदाता को इतनी परेशानी क्यों झेलनी पड़ती?

जब मेहनत की फसल बेचने के लिए किसान को सड़क पर रात बितानी पड़े और वह जहर खाने जैसी बात कहने लगे, तो यह सिर्फ अव्यवस्था नहीं बल्कि सिस्टम पर बड़ा सवाल है। अब देखना होगा कि प्रशासन और सरकार किसानों की इस पीड़ा का समाधान कब तक निकाल पाते हैं।

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