पारिवारिक विवाद से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक नाबालिग बच्ची की कस्टडी उसके पिता को सौंपने के आदेश दिए हैं। सुनवाई के दौरान सबसे अहम मोड़ तब आया, जब बच्ची ने खुद अदालत के सामने कहा कि वह अपने पिता के साथ सुरक्षित महसूस करती है और उन्हीं के साथ रहना चाहती है।
मामला पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे पारिवारिक विवाद से जुड़ा है। आरोप है कि इस विवाद के दौरान मां ने पिता के खिलाफ छेड़छाड़ और पॉक्सो एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए बच्ची को पिता से अलग कर शेल्टर होम भेज दिया था।
इसके बाद पिता ने खुद पर लगे आरोपों और बच्ची से अलग किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने अदालत से अपनी बेटी की कस्टडी देने की मांग की और पूरे मामले की निष्पक्ष सुनवाई की अपील की।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बच्ची को अदालत में पेश करने के निर्देश दिए। जस्टिस ने बच्ची से अलग से बातचीत की और उसकी बात सुनी। इसी दौरान बच्ची ने एक लिखित पत्र भी अदालत को सौंपा और स्पष्ट कहा कि वह अपने पिता के साथ सुरक्षित है तथा आगे भी उन्हीं के साथ रहना चाहती है।
बच्ची के बयान और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी मामले में बच्चे का सर्वोत्तम हित और उसकी इच्छा सबसे महत्वपूर्ण होती है। अदालत ने माना कि माता-पिता के आपसी विवाद का असर बच्चे के भविष्य पर नहीं पड़ना चाहिए और उसे किसी भी कानूनी लड़ाई का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बच्ची की सुरक्षा, शिक्षा और उसके हितों को प्राथमिकता देते हुए उसकी कस्टडी पिता को सौंपने के निर्देश जारी कर दिए। अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों का कल्याण सर्वोपरि है और उन्हें पारिवारिक विवादों या कानूनी संघर्ष का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।

