इंदौर। इंदौर की सड़कों पर बिगड़ते ट्रैफिक और नियमों की खुलेआम अनदेखी को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रशासन कार्रवाई और निगरानी के दावे तो कर रहा है, लेकिन उसका असर सड़कों पर दिखाई नहीं दे रहा। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि हाईकोर्ट के सामने तक गलत नंबर प्लेट, बिना नंबर प्लेट और हूटर-सायरन लगी गाड़ियां नजर आ रही हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर शहर में निगरानी के लिए सैकड़ों CCTV कैमरे लगे हैं और ट्रैफिक जवान भी तैनात हैं, तो फिर सड़कों की स्थिति में सुधार क्यों नहीं दिख रहा है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ चालान काटने से ट्रैफिक व्यवस्था ठीक नहीं होगी, बल्कि कार्रवाई का असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
दरअसल, पूर्व पार्षद महेश गर्ग की ओर से अधिवक्ता मनीष यादव और अनस मकरानी ने पिछली सुनवाई के आदेश का हवाला देते हुए प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए। कोर्ट ने पिछली सुनवाई में शहर में लगे CCTV कैमरों और प्रमुख चौराहों पर तैनात ट्रैफिक जवानों की जानकारी शपथपत्र के जरिए मांगी थी। सरकार की ओर से बताया गया कि शहर के अलग-अलग चौराहों पर 660 CCTV कैमरे लगाए गए हैं और प्रमुख स्थानों पर ट्रैफिक जवान भी तैनात हैं।
लेकिन याचिकाकर्ता की ओर से इस दावे पर आपत्ति जताई गई। उनका कहना था कि अगर इतनी बड़ी निगरानी व्यवस्था मौजूद है और ट्रैफिक अमला भी तैनात है, तो फिर शहर की सड़कों पर बदहाली क्यों नजर आ रही है। आरोप लगाया गया कि पुलिस का ज्यादा जोर ड्रिंक एंड ड्राइव के चालान पर दिखाई देता है, जबकि गलत नंबर प्लेट, बिना नंबर प्लेट, हूटर-सायरन और दूसरे ट्रैफिक उल्लंघनों पर प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आ रही।
इसी पर हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि उसे खुद मैदान में कार्रवाई का असर नजर नहीं आ रहा। कोर्ट ने यहां तक कहा कि हाईकोर्ट के सामने तक लोग ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते दिखाई दे रहे हैं। गलत या बिना नंबर प्लेट वाली गाड़ियां सड़कों पर घूम रही हैं, ऐसे में सिर्फ चालान काटते रहने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।
हाईकोर्ट की चिंता सिर्फ नंबर प्लेट तक सीमित नहीं है। निजी वाहनों में अवैध हूटर, फ्लैश लाइट और VIP स्टिकर लगाने का मामला भी पहले कोर्ट के सामने आ चुका है। कोर्ट पहले ही ऐसे अवैध उपकरण और अनियमित नंबर प्लेट हटाने के निर्देश दे चुका है। अब सवाल यह है कि अगर निर्देश पहले से मौजूद हैं, तो फिर इनका पालन सड़कों पर क्यों नहीं दिखाई दे रहा।
सुनवाई के दौरान शहर में भारी वाहनों के प्रवेश का मुद्दा भी उठा। कोर्ट ने सवाल किया कि दिन के समय भारी वाहनों को शहर में प्रवेश करने से रोकने के लिए क्या व्यवस्था की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए शहरों में दिन के समय भारी वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने की जरूरत बताई गई।
अब हाईकोर्ट ने सरकार से इन सभी मुद्दों पर विस्तृत जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर वाले सप्ताह में होगी। यानी अब सरकार को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि शहर में कितने CCTV कैमरे लगे हैं या कितने जवान तैनात हैं। सवाल यह होगा कि इन व्यवस्थाओं से सड़क पर वास्तव में कितना बदलाव आया।
क्योंकि हाईकोर्ट का सवाल सीधा है—अगर 660 CCTV कैमरे लगे हैं, चौराहों पर जवान तैनात हैं और कार्रवाई के दावे किए जा रहे हैं, तो फिर गलत नंबर प्लेट, बिना नंबर प्लेट और नियम तोड़ने वाली गाड़ियां खुलेआम सड़कों पर क्यों दौड़ रही हैं? इंदौर को सिर्फ चालान काटने वाला शहर नहीं, बल्कि ट्रैफिक नियमों का पालन कराने वाला शहर बनाना होगा। अब हाईकोर्ट ने प्रशासन से इसी कार्रवाई का हिसाब मांगना शुरू कर दिया है।

