इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की नई वेबसाइट और ऑनलाइन सुनवाई की व्यवस्था में सामने आ रही तकनीकी परेशानियों को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। लगातार मिल रही शिकायतों और तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए कोर्ट ने संबंधित IT व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं और पूरे सिस्टम की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने के निर्देश दिए हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान वेबसाइट और ई-हियरिंग से जुड़ी कई समस्याएं कोर्ट के सामने आईं। बताया गया कि वेबसाइट में सुधार और अपडेट के लिए समय निर्धारित किए जाने के बावजूद तय अवधि के बाद भी तकनीकी परेशानियां पूरी तरह खत्म नहीं हुईं।
जानकारी के मुताबिक 25 और 26 अगस्त के आसपास जजों के ग्रुप में वेबसाइट अपडेट को लेकर जानकारी साझा की गई थी। इसमें वेबसाइट को अपडेट करने में करीब आठ दिन लगने की बात कही गई थी। लेकिन इसके बाद भी वेबसाइट की तकनीकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होने की बात सामने आई।
सुनवाई के दौरान मौजूद अधिवक्ताओं ने भी नई वेबसाइट को लेकर अपनी परेशानियां कोर्ट के सामने रखीं। कुछ वकीलों ने तो पुरानी वेबसाइट को इस्तेमाल के लिहाज से बेहतर बताया। यानी जिस डिजिटल प्लेटफॉर्म से न्यायिक प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने की उम्मीद थी, वही अब तकनीकी अड़चनों को लेकर सवालों के घेरे में है।
तकनीकी गड़बड़ियों को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित IT स्टाफ की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने चीफ जस्टिस के स्तर पर संबंधित IT स्टाफ के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की है।
इसके साथ ही रजिस्ट्रार IT-CSPA के.एस. कुशवाहा को पूरे मामले की जांच करने, संबंधित कर्मचारियों की भूमिका और जिम्मेदारी तय करने और सात दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन मामला सिर्फ विभागीय जांच तक सीमित नहीं रहेगा। हाईकोर्ट ने पूरे सिस्टम का स्वतंत्र IT ऑडिट कराने का भी फैसला किया है। इसके लिए टीसीएस, इन्फोसिस या एलएंडटी टेक्नोलॉजी सर्विसेज जैसी तकनीकी कंपनियों के विशेषज्ञों की मदद लिए जाने की संभावना है।
इस स्वतंत्र ऑडिट में सिर्फ वेबसाइट ही नहीं, बल्कि पूरे IT सिस्टम की तकनीकी क्षमता और उसकी कार्यप्रणाली की जांच की जाएगी। ऑडिट की रिपोर्ट 30 दिन के भीतर कोर्ट के सामने पेश करनी होगी।
सुनवाई के दौरान सिस्टम की जांच भी की गई और इस दौरान बफरिंग तथा सिस्टम हैंग होने जैसी तकनीकी परेशानियां सामने आने की बात कही गई। यही वजह है कि मामला और गंभीर हो गया है। क्योंकि ई-हियरिंग के दौरान तकनीकी रुकावट सिर्फ वेबसाइट इस्तेमाल करने की परेशानी नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर न्यायिक कार्यवाही पर भी पड़ सकता है।
हाईकोर्ट की इस कार्रवाई से साफ है कि अदालत डिजिटल न्याय व्यवस्था में किसी भी तरह की तकनीकी लापरवाही को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। अब सात दिन में विभागीय जांच की रिपोर्ट सामने आएगी और 30 दिन में स्वतंत्र IT ऑडिट के जरिए यह पता लगाने की कोशिश होगी कि आखिर तकनीकी समस्या की जड़ कहां है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई वेबसाइट में ही तकनीकी खामियां हैं या फिर सिस्टम तैयार करने और उसे संभालने में बड़ी चूक हुई है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब सिर्फ वेबसाइट में सुधार की बात नहीं है, बल्कि पूरी IT व्यवस्था की क्षमता, कार्यप्रणाली और जवाबदेही की भी परीक्षा होने वाली है।

