सीधी जिला अस्पताल पर गंभीर सवाल: एक साल में 53 प्रसूताओं की मौत, मानवाधिकार आयोग ने मांगा जवाब

सीधी। मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल सीधी जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। जिला अस्पताल से सामने आए आंकड़ों ने न सिर्फ स्थानीय प्रशासन बल्कि पूरे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार, बीते एक वर्ष के दौरान सीधी जिला अस्पताल में 53 प्रसूताओं की मौत हो चुकी है। मातृत्व सुरक्षा से जुड़े इतने बड़े आंकड़े ने प्रदेशभर में चिंता बढ़ा दी है और अब यह मामला मानवाधिकार आयोग तक पहुंच गया है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को नोटिस जारी किया है। आयोग ने एक सप्ताह के भीतर पूरे मामले पर विस्तृत जवाब तलब किया है और यह जानना चाहा है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में प्रसूताओं की मौत के पीछे क्या कारण रहे और अब तक जिम्मेदारों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है।

सीधी जिला अस्पताल लंबे समय से संसाधनों की कमी और अव्यवस्थाओं से जूझता रहा है। दूर-दराज के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों से गर्भवती महिलाओं को बेहतर इलाज की उम्मीद में यहां लाया जाता है, लेकिन आरोप हैं कि अस्पताल में पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर, जरूरी चिकित्सा उपकरण और प्रसव से जुड़ी सुविधाओं का अभाव है। समय पर उपचार न मिलने और प्रसव प्रबंधन में खामियों के चलते कई महिलाओं की हालत गंभीर हो जाती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिला अस्पताल इलाज का केंद्र बनने के बजाय केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। गंभीर मरीजों को तत्काल बड़े शहरों के अस्पतालों के लिए रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में लंबी दूरी और खराब स्वास्थ्य स्थिति के कारण कई महिलाएं रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं। परिजनों का आरोप है कि यदि समय पर समुचित इलाज और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।

एक साल में 53 प्रसूताओं की मौत ने स्वास्थ्य विभाग के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें मातृ मृत्यु दर को कम करने और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की बात कही जाती रही है। अब मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप के बाद सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या फिर यह मामला भी जांच और आश्वासनों तक सीमित रह जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मातृत्व जैसी संवेदनशील स्वास्थ्य सेवाओं में इतनी बड़ी चूक की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सीधी जिला अस्पताल की बदहाल व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे या फिर प्रसूताओं की मौत का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा? मानवाधिकार आयोग के नोटिस के बाद अब स्वास्थ्य विभाग के जवाब और संभावित कार्रवाई का इंतजार किया जा रहा है।

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