पन्ना। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले का अजयगढ़ क्षेत्र इन दिनों विकास और विस्थापन के बीच गहरे संघर्ष का गवाह बना हुआ है। केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत मझगाय और रुंझ बांध के कारण जलमग्न हुए कुंवरपुर, बालूपुर, बनेहरी और विश्रामगंज जैसे गांवों में हालात को लेकर ग्रामीण आंदोलन कर रहे हैं। बेघर हुए आदिवासी और किसान उफनते पानी के बीच लकड़ी के ढांचों यानी चिताओं पर लेटकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं और ‘न्याय दो या मार दो’ के नारे लगा रहे हैं।
आंदोलनकारियों और जय किसान संगठन का आरोप है कि जमीनों का अधिग्रहण पारदर्शी ग्रामसभा की सहमति के बिना किया गया। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि उपजाऊ जमीनों को असिंचित बताकर मुआवजे में गड़बड़ी की गई और धारा 163 लागू कर उनकी आवाज को दबाने की कोशिश हुई।
सबसे बड़ा विवाद पुनर्वास पैकेज को लेकर है। ग्रामीणों का दावा है कि सरकार की ओर से घोषित 12 लाख 50 हजार रुपये के पुनर्वास पैकेज का लाभ उन्हें नहीं मिला है। उनका कहना है कि उन्हें न तो नया पैकेज मिला और न ही पुराने 5 लाख रुपये की पूरी राशि का हक मिला, जबकि दूसरी तरफ परियोजना का पानी उनके घरों की चौखट तक पहुंच चुका है।
वहीं प्रशासन इन दावों को खारिज करते हुए अलग आंकड़े पेश कर रहा है। प्रशासन के अनुसार, रुंझ परियोजना के 670 और मझगाय परियोजना के 1219, यानी कुल 1889 विस्थापित परिवारों को 5 लाख रुपये की राशि बांटी जा चुकी है। प्रशासन का कहना है कि 12 लाख 50 हजार रुपये की कुल राशि पूरी करने के लिए अतिरिक्त 7 लाख 50 हजार रुपये के अंतर भुगतान की प्रक्रिया भी चल रही है।
इसके लिए विशेष कैंप लगाए जा रहे हैं, जहां शपथ पत्र और बैंक संबंधी जानकारी जमा कराने के बाद अतिरिक्त राशि के भुगतान का दावा किया जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ आंदोलनकारी ग्रामीण अभी भी जल सत्याग्रह और चिता आंदोलन जारी रखे हुए हैं।
एक तरफ प्रशासन के आंकड़े हैं, जिनमें हजारों विस्थापित परिवारों को भुगतान किए जाने की बात कही जा रही है, तो दूसरी तरफ उफनते पानी के बीच चिताओं पर बैठे ग्रामीण अपने हक और पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। कागजों में दर्ज दावों और जमीन पर दिखाई दे रही तस्वीर के बीच का यह अंतर अजयगढ़ में एक बड़े मानवीय संकट की ओर इशारा कर रहा है।
अब बड़ा सवाल यही है कि जल सत्याग्रह के पांचवें दिन भी जारी इस आंदोलन का समाधान कब निकलेगा और विस्थापित परिवारों की पुनर्वास और मुआवजे से जुड़ी मांगों पर प्रशासन और ग्रामीणों के बीच सहमति कैसे बनेगी।

