बैतूल। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में एक ऐसी परंपरा आज भी निभाई जा रही है, जिसे देखकर किसी की भी रूह कांप जाए, लेकिन यहां के ग्रामीण इसे आस्था और विश्वास के साथ खुशी-खुशी पूरा करते हैं।
चैत्र महीने में आयोजित होने वाले पांच दिवसीय ‘नाड़ा गाड़ा’ उत्सव में श्रद्धालु अपने शरीर के दोनों ओर मोटी और नुकीली सुइयों से धागा पिरोते हैं और फिर उसी अवस्था में नाचते-गाते हुए अनुष्ठान पूरा करते हैं, यह दृश्य देखने में किसी सजा से कम नहीं लगता।
इस परंपरा के पीछे ग्रामीणों की गहरी मान्यता जुड़ी है, उनका विश्वास है कि बच्चों को चेचक जैसी बीमारियों से बचाने या ठीक होने की मन्नत पूरी होने पर माता को प्रसन्न करने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।
बैतूल जिले के आठनेर ब्लॉक के धामनगांव में आयोजित इस परंपरा में मन्नत पूरी होने वाले लोग पांच दिन तक पूजा-अर्चना करते हैं और अंतिम दिन शरीर में नाड़ा पिरोकर विशेष अनुष्ठान करते हैं, इस दौरान घाव वाले स्थान पर हल्दी और घी लगाया जाता है और शाम को बैलगाड़ियों को बांधकर सामूहिक रूप से खींचा जाता है।
ग्रामीणों का दावा है कि करीब 500 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में उन्हें न दर्द महसूस होता है और न ही किसी तरह का संक्रमण होता है, वे इसे माता की कृपा मानते हैं और पूरे उत्साह के साथ नाचते-गाते इसे निभाते हैं।
हालांकि चिकित्सा विज्ञान इस तरह की परंपरा को अंधविश्वास और जोखिम भरा मानता है, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह आस्था, एकजुटता और परंपरा का प्रतीक है, जहां सैकड़ों लोग शामिल होकर सामूहिक नृत्य और शोभायात्रा के जरिए अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।

