कमजोर नेतृत्व या रणनीतिक चूक? बहुमत होने के बावजूद राज्यसभा की तीसरी सीट क्यों हार गई कांग्रेस, एमपी में बगावत के सुर तेज

भोपाल। मध्य प्रदेश की राज्यसभा चुनाव की तीसरी सीट अब सिर्फ एक चुनावी हार का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान और नेतृत्व पर उठते सवालों का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। पार्टी के कई नेताओं और समर्थकों के बीच अब इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि आखिर बहुमत के बावजूद कांग्रेस यह सीट कैसे गंवा बैठी।

पार्टी के भीतर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। ऐसे समय में जब कांग्रेस को एकजुटता का संदेश देना चाहिए था, उसके वरिष्ठ नेता सार्वजनिक मंचों पर आपसी मतभेदों में उलझे दिखाई दिए। राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद कांग्रेस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की, जिसमें पार्टी के कई बड़े नेता और कानूनी सलाहकार मौजूद थे।

इसी दौरान एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने पार्टी के भीतर की दरार को उजागर कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मंच से कहा कि जेपी धनोपिया को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए। इस पर प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने जवाब दिया कि “हम कर लेंगे।” इस टिप्पणी के बाद दिग्विजय सिंह नाराज नजर आए, हालांकि मंच की गरिमा को देखते हुए उन्होंने हाथ जोड़ लिए। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

वीडियो सामने आने के बाद दिग्विजय सिंह के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर खुलकर उनका समर्थन करना शुरू कर दिया, जबकि प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के खिलाफ नाराजगी जाहिर की जाने लगी। इससे साफ संकेत मिले कि मध्य प्रदेश कांग्रेस में सब कुछ सामान्य नहीं है।

राज्यसभा की तीसरी सीट हाथ से निकलने के बाद अब मौजूदा नेतृत्व की रणनीति और क्षमता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। पार्टी के भीतर चर्चा है कि जब कांग्रेस के पास आवश्यक संख्या से अधिक विधायक मौजूद थे, तब भी वह सीट बचाने में क्यों नाकाम रही। यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या पार्टी ने किसी संभावित संकट से निपटने के लिए कोई वैकल्पिक रणनीति यानी प्लान-बी तैयार नहीं किया था।

दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के समर्थक अब खुलकर यह कह रहे हैं कि यदि पार्टी की कमान उनके हाथ में होती तो शायद यह स्थिति पैदा नहीं होती। उनका दावा है कि अनुभवी नेतृत्व ऐसी रणनीतिक चूक नहीं होने देता। मीनाक्षी नटराजन के नाम की घोषणा के समय से ही कुछ नेताओं की ओर से असहमति जताई जा रही थी। दिग्विजय सिंह के करीबी और दो बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके नरेश ज्ञानचंदानी ने भी दिग्विजय सिंह को उम्मीदवार न बनाए जाने पर सवाल उठाए थे। बाद में उन्होंने पार्टी से इस्तीफा भी दे दिया था।

मौजूदा नेतृत्व पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि वर्ष 2016 में कांग्रेस के पास पर्याप्त बहुमत नहीं था, फिर भी पार्टी राज्यसभा की तीसरी सीट जीतने में सफल रही थी। उस समय कमलनाथ ने भोपाल में डेरा डालकर विधायकों को एकजुट रखा था और अन्य दलों का समर्थन जुटाकर विवेक तन्खा को जीत दिलाई थी। उस रणनीति को कांग्रेस के भीतर सफल राजनीतिक प्रबंधन का उदाहरण माना गया था।

अब सवाल यह उठ रहा है कि जब इस बार कांग्रेस के पास संख्या बल अपेक्षाकृत बेहतर था और बहुमत से अधिक विधायक मौजूद थे, तब भी पार्टी को अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए अलग-अलग प्रयास क्यों करने पड़े। क्या यह मौजूदा नेतृत्व की कमजोरी का संकेत है, या फिर रणनीतिक स्तर पर कोई बड़ी चूक हुई है?

फिलहाल राज्यसभा की यह हार कांग्रेस के लिए सिर्फ एक चुनावी झटका नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता, नेतृत्व क्षमता और भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर गंभीर आत्ममंथन का विषय बन गई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी इन सवालों का जवाब कैसे देती है और क्या वह अपने भीतर उठ रहे असंतोष के सुरों को शांत कर पाती है या नहीं।

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