मऊगंज। मध्य प्रदेश के मऊगंज जिला अस्पताल से सामने आई तस्वीरें सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। आरोप है कि अस्पताल में बदइंतजामी इस कदर हावी हो चुकी है कि मरीजों की जिंदगी भगवान भरोसे चल रही है। डॉक्टर समय पर उपलब्ध नहीं हैं, स्ट्रेचर की व्यवस्था चरमरा चुकी है और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि साफ-सफाई का काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारी मरीजों को इंजेक्शन लगाते नजर आ रहे हैं।
अस्पताल की हालत ऐसी बताई जा रही है कि एक-एक बेड पर दो-दो मरीजों का इलाज किया जा रहा है। भीषण गर्मी में दर्द से कराहते मरीजों को न तो पर्याप्त सुविधाएं मिल रही हैं और न ही समय पर चिकित्सकीय सहायता। परिजनों का आरोप है कि जब से ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रद्युमन शुक्ला ने अस्पताल की जिम्मेदारी संभाली है, तब से व्यवस्थाएं लगातार बिगड़ती चली गई हैं।
मामले ने तब तूल पकड़ा जब भोपाल से डिप्टी डायरेक्टर लालप्रणय सिंह अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंचे। इस दौरान मरीजों और उनके परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा। लोगों ने अधिकारियों के सामने आरोप लगाया कि जिला अस्पताल में सामान्य उपचार के लिए जरूरी दवाइयां और इंजेक्शन तक उपलब्ध नहीं हैं। मरीजों ने यह भी शिकायत की कि डॉक्टर समय पर नहीं मिलते और कई बार घंटों इंतजार करना पड़ता है।
निरीक्षण के दौरान कुछ परिजन अपने मरीजों को कंधे पर उठाकर ले जाते दिखाई दिए। अधिकारियों की ओर से स्ट्रेचर उपलब्ध होने की बात कही गई, लेकिन परिजनों का कहना था कि स्ट्रेचर चलाने के लिए कोई कर्मचारी मौजूद नहीं था। मजबूरी में उन्हें अपने बीमार परिजनों को खुद उठाकर इधर-उधर ले जाना पड़ा।
इस पूरे मामले की सबसे चिंताजनक तस्वीर तब सामने आई, जब कथित तौर पर आउटसोर्स कर्मचारियों को मरीजों का उपचार करते हुए देखा गया। वीडियो में एक कर्मचारी बुजुर्ग मरीज को इंजेक्शन लगाने की कोशिश करता नजर आ रहा है। आरोप है कि संबंधित कर्मचारी चिकित्सकीय कार्यों के लिए प्रशिक्षित या अधिकृत नहीं था। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बिना उचित प्रशिक्षण और अधिकार के इस तरह का कार्य मरीजों की जान के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि कुछ मामलों में चिकित्सकीय प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और मरीजों को अनावश्यक पीड़ा झेलनी पड़ी। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
अस्पताल में डॉक्टरों की अनुपस्थिति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि कई वार्डों और ओपीडी में चिकित्सक अपनी ड्यूटी के दौरान मौजूद नहीं मिले। परिजनों का आरोप है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
जब इस पूरे मामले को लेकर ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रद्युमन शुक्ला से सवाल किया गया, तो उन्होंने स्वीकार किया कि संबंधित कर्मचारी आउटसोर्स श्रेणी के हैं और उनका कार्य उपचार करना नहीं है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि यदि ये कर्मचारी चिकित्सा कार्यों के लिए अधिकृत नहीं हैं, तो उन्हें मरीजों के उपचार से जुड़े कार्य करने की अनुमति किस आधार पर दी गई।
यह पहला मौका नहीं है जब मऊगंज अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठे हों। इससे पहले भी अस्पताल में गैर-अधिकृत व्यक्तियों द्वारा मरीजों का उपचार किए जाने के आरोप सामने आ चुके हैं। हालांकि हर बार कार्रवाई के दावे किए गए, लेकिन हालात में कोई बड़ा सुधार दिखाई नहीं दिया।
अब प्रशासन ने पूरे मामले की जांच की बात कही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार जिम्मेदारों पर वास्तव में कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी जांच और आश्वासनों तक सीमित रह जाएगा। क्योंकि जब अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल खड़े होने लगें, तो जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी हो जाता है।

