ग्वालियर। ग्वालियर हाईकोर्ट ने फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी पाने वाले शिक्षकों को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की है कि अदालत में वही व्यक्ति राहत मांगने आए, जिसके हाथ साफ हों। कोर्ट ने साफ कहा कि धोखाधड़ी किसी भी अधिकार और दावे को समाप्त कर देती है।
दरअसल, मामला उन सरकारी शिक्षकों से जुड़ा है, जिनकी नियुक्ति दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर हुई थी। बाद में जांच के दौरान इन प्रमाण पत्रों की वैधता पर सवाल उठे। हाईकोर्ट के निर्देश पर हुए सत्यापन में सामने आया कि कई प्रमाण पत्रों का मेडिकल बोर्ड के रिकॉर्ड और संबंधित रजिस्टर में कोई उल्लेख ही नहीं था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता अपने दावों के समर्थन में कोई विश्वसनीय मेडिकल दस्तावेज पेश नहीं कर सके। कोर्ट ने कहा कि केवल तकनीकी आधार पर राहत नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब सरकारी रिकॉर्ड स्वयं फर्जीवाड़े की ओर इशारा कर रहे हों।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त सरकारी नौकरी को कानून का संरक्षण नहीं मिल सकता। अदालत ने कहा कि जब दोबारा सत्यापन में प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए हैं, तो नियुक्ति रद्द करने के फैसले को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी माना कि सुनवाई का पर्याप्त अवसर न मिलने का तर्क ऐसे मामलों में पर्याप्त नहीं है, जहां दस्तावेजों की प्रामाणिकता ही संदिग्ध हो। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा की गई कार्रवाई को पूरी तरह वैध ठहराते हुए सभी अपीलें खारिज कर दीं।
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी अब चर्चा का विषय बनी हुई है, जिसमें अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायालय से राहत पाने के लिए ईमानदारी और पारदर्शिता सबसे जरूरी है।

