भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार ने वन विभाग के फ्रंटलाइन स्टाफ को बड़ी कानूनी राहत दी है। अब ड्यूटी के दौरान यदि किसी वन कर्मचारी या अधिकारी को विषम परिस्थितियों में हथियार का इस्तेमाल करना पड़ता है, तो उसके खिलाफ पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकेगी। इस फैसले का उद्देश्य वनकर्मियों को बिना डर के अपने कर्तव्यों का पालन करने का सुरक्षा कवच देना है।
सरकार द्वारा जारी नए निर्देशों के अनुसार, ड्यूटी के दौरान आग्नेयास्त्र का इस्तेमाल होने की स्थिति में सबसे पहले पूरे मामले की मजिस्ट्रियल जांच कराई जाएगी। जब तक यह जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक पुलिस संबंधित वन कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ न तो एफआईआर दर्ज कर सकेगी और न ही उसे गिरफ्तार कर पाएगी।
यदि मजिस्ट्रियल जांच में यह सामने आता है कि हथियार का इस्तेमाल अनावश्यक, अनुचित या जरूरत से ज्यादा किया गया था, तब भी पुलिस सीधे कार्रवाई नहीं करेगी। ऐसे मामलों में आगे की कार्रवाई तभी शुरू होगी, जब राज्य सरकार जांच रिपोर्ट को आधिकारिक रूप से स्वीकार करेगी।
यह नया प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS-2023 की धारा 218(2) के तहत लागू किया गया है। इसका मकसद वन एवं वन्यजीवों की सुरक्षा में लगे अधिकारियों और कर्मचारियों को कानूनी संरक्षण देना है, ताकि वे बिना किसी अनावश्यक दबाव के अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें।
इस फैसले का लाभ केवल वनरक्षक और वनपाल तक सीमित नहीं रहेगा। वन क्षेत्रपाल, रेंजर, सहायक वन संरक्षक, उप वनमंडल अधिकारी, वनमंडल अधिकारी, उप वन संरक्षक, क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक और फील्ड डायरेक्टर समेत वन विभाग के सभी अधिकृत अधिकारियों को इसका लाभ मिलेगा।
दरअसल, वन्यजीव तस्करों, अवैध शिकारियों और लकड़ी माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई के दौरान कई बार वनकर्मियों को आत्मरक्षा या कानून लागू कराने के लिए हथियार का इस्तेमाल करना पड़ता है। पहले ऐसी घटनाओं के बाद सीधे पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर बना रहता था, लेकिन अब सरकार के इस फैसले से वन विभाग के फ्रंटलाइन स्टाफ को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है और वे अधिक आत्मविश्वास के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकेंगे।

