मध्यप्रदेश विधानसभा में सियासी शोले, अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान तीखी नोकझोंक

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान सियासी पारा चढ़ गया और सदन में तीखे तंज और जवाबी हमले देखने को मिले। कांग्रेस विधायक राजेंद्र सिंह ने पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल समेत अग्रिम पंक्ति के मंत्रियों की तुलना फिल्म Sholay के ठाकुर से कर दी। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि प्रहलाद पटेल की स्थिति ऐसी है जैसे आसमान से टपके और खजूर पर अटके।

इस पर प्रहलाद पटेल ने भी पलटवार करते हुए कहा कि हाथ कटे हैं लेकिन पैर बचे हैं और उन्हें खुशी है कि वे ऐसे व्यक्ति रहेंगे जो 108 नदियों के उद्गम स्थल तक पहुंच सकते हैं। सदन में इस बयान पर हलचल तेज हो गई।

भाजपा विधायक भूपेंद्र सिंह ने सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि मध्यप्रदेश प्रधानमंत्री आवास निर्माण में पहले स्थान पर है, गेहूं उत्पादन में दूसरे नंबर पर है और दुग्ध उत्पादन में नंबर वन है। इस पर कांग्रेस विधायक भंवर सिंह शेखावत ने तंज कसते हुए कहा कि 21 साल से आपकी ही सरकार है और गुंडागर्दी पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कैलाश विजयवर्गीय का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा शेर दहाड़ नहीं पा रहा है और इंदौर सूना हो गया है।

सदन में एक और तीखी बहस कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया और उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार के बीच देखने को मिली। बरैया ने कहा कि बेटियों का कलेक्टर बनना संविधान की देन है, जिस पर मंत्री परमार ने उन्हें भड़काऊ बयान देने वाला बताया। जवाब में बरैया ने तीखी प्रतिक्रिया दी और जनसंघ को लेकर टिप्पणी की, जिसे सभापति ने रिकॉर्ड से हटा दिया। इस पर प्रहलाद पटेल ने कहा कि जिस दौर की बात की जा रही है, तब जनसंघ बना भी नहीं था।

किसानों के मुद्दों पर चर्चा के दौरान कपास और सोयाबीन को लेकर भी सवाल उठे। मुख्यमंत्री के वक्तव्य के बाद नेता प्रतिपक्ष ने प्रतिक्रिया दी तो सदन में उतावलापन और तीखी टिप्पणी को लेकर बहस छिड़ गई। कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि मुख्यमंत्री कभी भी वक्तव्य दे सकते हैं और नेता प्रतिपक्ष प्रतिक्रिया दे सकते हैं, लेकिन वक्तव्य के बाद विषय से इतर बातें नहीं जोड़ी जानी चाहिए। इस पर नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जब आप उतावले होते हैं तो मुंह से क्या-क्या निकलता है, सबको याद है।

बजट सत्र की यह कार्यवाही एक बार फिर दिखा गई कि मध्यप्रदेश विधानसभा में बहस सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि तंज, तीखे संवाद और राजनीतिक नाटकीयता की भी होती है।

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