बुरहानपुर। मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल से एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है, जहां आजादी के 78 साल बाद भी मासूम बच्चों की आंगनवाड़ी झोपड़ी में चल रही है। मामला बुरहानपुर जिला के बोमल्यापाट गांव का है, जहां मूलभूत सुविधाओं के अभाव में 147 बच्चों का भविष्य भगवान भरोसे है।
बुरहानपुर से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में वर्ष 2017 से आंगनवाड़ी केंद्र एक कच्ची झोपड़ी में संचालित हो रहा है। न वहां तक पहुंचने का पक्का रास्ता है, न पीने के पानी की व्यवस्था और न ही सुरक्षित भवन। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तो हैं, लेकिन भवन नहीं है। मासूम बच्चे कच्ची जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करते हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता रायका जादव के अनुसार पिछले पांच वर्षों से केंद्र इसी झोपड़ी में चल रहा है। सरपंच, सचिव और उच्च अधिकारियों से कई बार शिकायत की गई, लेकिन अधूरा पड़ा भवन आज भी निर्माण की राह देख रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि भवन निर्माण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जिस झोपड़ी में केंद्र चल रहा है, उसके मालिक रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्य में पलायन कर चुके हैं। उनके लौटने पर बच्चों को खुले आसमान या पेड़ के नीचे बैठना पड़ सकता है। 181 पर शिकायत के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
स्थानीय विधायक मंजू दादू, एसडीएम भागीरथ वाखला और महिला बाल विकास विभाग की अधिकारी भारती आवासे पर भी ग्रामीणों ने लापरवाही के आरोप लगाए हैं। हालांकि एसडीएम ने जांच का आश्वासन दिया है और कहा है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी तथा भवन निर्माण पूरा कराया जाएगा।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या इन मासूम बच्चों का भविष्य यूं ही झोपड़ी में सिमटता रहेगा या प्रशासन जागेगा और इन्हें उनका हक दिलाएगा।

