करीब 30 साल से लंबित नर्मदा और सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े पुनर्वास और पुनर्स्थापन व्यय का विवाद आखिरकार सुलझ गया है। मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच हुए इस महत्वपूर्ण समझौते के बाद मध्य प्रदेश को बड़ी आर्थिक राहत मिली है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बताया कि इस समझौते से प्रदेश के खजाने पर पड़ने वाला भारी वित्तीय बोझ कम हुआ है और राज्य को करीब 1268 करोड़ रुपये की सीधी बचत होगी।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मुताबिक पहले अटॉर्नी जनरल के प्रस्तावित फॉर्मूले के आधार पर मध्य प्रदेश को करीब 1500 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ सकता था। लेकिन चारों राज्यों के बीच हुई सहमति और मध्य प्रदेश की पैरवी के बाद नई व्यवस्था लागू की गई। अब मध्य प्रदेश को गुजरात को सिर्फ 231 करोड़ 80 लाख रुपये का भुगतान करना होगा। इसके साथ ही परियोजना में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 31.98 प्रतिशत से घटाकर 16.17 प्रतिशत कर दी गई है, जिससे राज्य को 1268 करोड़ रुपये की बड़ी राहत मिली है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह समझौता सिर्फ आर्थिक बचत तक सीमित नहीं है, बल्कि सरदार सरोवर परियोजना मध्य प्रदेश के विकास की मजबूत आधारशिला भी बन रही है। इस परियोजना से प्रदेश की लगभग 31 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिल रहा है, जिससे मालवा, निमाड़ और आसपास के क्षेत्रों के किसानों को सीधा फायदा पहुंच रहा है।
इतना ही नहीं, नर्मदा का पानी जबलपुर, कटनी, देवास, उज्जैन, इंदौर और धार जैसे कई बड़े शहरों तक पहुंच रहा है, जिससे लाखों लोगों को पेयजल और अन्य जरूरतों के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो रहा है। वहीं पीथमपुर, देवास और विक्रम उद्योगपुरी जैसे प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों को भी इसी परियोजना से जल आपूर्ति मिल रही है, जिससे उद्योगों के विकास को नई गति मिली है।
करीब तीन दशक से अटका यह विवाद अब समाप्त हो चुका है और सरकार का दावा है कि इस समझौते से न सिर्फ प्रदेश को हजारों करोड़ रुपये की राहत मिली है, बल्कि भविष्य में सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक विकास के लिए भी नई संभावनाओं के रास्ते खुलेंगे।

